पढ़ना चाहते हो? आओ पढ़ो। पढ़ो की कैसे ख़याल आते हैं, क्या देखना चाहिए, क्या दिखता है और जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, क्या छूट जाता है। अगर सुंदर कविताएँ पढ़नी हैं, रख दो इसे, कुछ और उठाओ। कुछ और उठाओ की इसमें ख़ूबसूरती नहीं है सिर्फ सूरती बातें हैं। मतलब असलियत खोजते हुए नक़ाब पर एक पत्थर है। पत्थर नक़ाब को लगा, पर कपड़ा ही था, पत्थर को घेर लिया। अब मेरा घेरा जाना पढ़ो और मेरा फेंका जाना पढ़ो। -आशावादी पत्थर
"बस बस असीम भाई बता दो ना कुछ कविताएँ हैं और कुछ आकाशवाणियाँ हैं। कविता को अंदर ही रहने दीजिए।"