मैं भी भारत उपन्यास हाशिए पर खड़े उन लोगों की कहानी हैं जिन्हें इतिहास के पन्नों में उतनी जगह नहीं मिली जितने के वे हकदार थे। भगत सिंह को जब फाँसी हुई तो वह लेनिन को पढ़ रहे थे, एक इंकलाबी दूसरे इंकलाबी से मिल रहा था। उस दिन उन्होंने एक सफ़हा मोड़ा था और आज उस सफ़हे को खोलने की जरूरत है। यह उपन्यास उस सफहे को खोलने और पढ़ने का एक प्रयास है। इस बार मेरे इस उपन्यास में शब्दों का वार्तालाप देश की मिट्टी से होगा, जहाँ से जन्म लेती है एक उम्मीद, जिसके आधार पर ही तो धरती का समस्त जीवन टिका हुआ है। मिट्टी से जुड़े कई सवाल जिनका जवाब सदियों से किसी भी व्यक्ति या सरकार के पास नहीं है, शायद उन सवालों के जवाब आपको इन शब्दों के सागर में डूबने से प्राप्त हो जाएँ क्योंकि गहरे सवालों के जवाब गहराई में उतरने से ही प्राप्त होते हैं।
समय बदलता रहा है और आगे भी बदलता रहेगा। शायद ही ज़मीन से जुड़े सवालों के जवाब कोई दे पाए ! क्योंकि मिट्टी से दूर रहकर मिट्टी के सवालों के जवाब दिए ही नहीं जा सकते ? और न ही समझा जा सकता हैं उन सवालों के गहरे अर्थों को? इनके अर्थों को जानने के लिए हमें मिट्टी में रहकर मिट्टी का होना पड़ता है और जंगल में रहकर जंगली बनना पड़ता है। इनसे दूर रहकर उनके अधिकारों के प्रति हम संवेदनशील नहीं हो सकते।
इस बार मैंने ज़मीन में कुछ शब्दों को बोने की कोशिश की है ताकि कुछ सवालों के जवाब पौधे बनकर उग जाएँ और चीख-चीख कर बहरों के कान के परदे फाड़ दें, जिन्हें सुनाई नहीं देता उन बेबस आवाज़ों का दर्द। देश के ग्रामीण परिवेश से लेकर शहर की समस्याओं से जूझते कुछ सवाल चरित्र बन आपके सामने इस उपन्यास में अब हाज़िर हैं।
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