इस पुस्तक का नाम मैंने मिस रोज इसलिए रखा है क्योंकि स्कूल के समय में एक लड़का था जो मुझे बहुत ज्यादा पसंद करता था बहुत ही सीधा साधा भोला भाला था, मेरा डेस्कमेट व अच्छा दोस्त था। उसकी फेवरेट फिल्म थी टाइटेनिक और फेवरेट हीरोइन थी उस फिल्म की हीरोइन मिस रोज इसलिए वह प्यार से मुझे इसी नाम से बुलाया करता था। वह क्लास में बैठा बैठा मेरी ड्राइंग बनाता रहता था और उस पर मिस रोज लिखता रहता था, अपनी हर कॉपी किताब के आखिरी पन्ने पर मेरी तारीफो मैं शायरियां लिखता था। उसकी आंखों में मैंने खुद के लिए कई बार प्यार महसूस किया, पर मैं किसी और को पसंद करती थी इसलिए मैं उसके प्यार को स्वीकार नहीं कर पायी।
पर जिंदगी के उस दौर में जब हालातों ने मुझे इस कदर तोड़ा था, कि मैं टूट कर बिखर गई थी इतनी हताश हो गई थी कि जिंदगी के मेरे लिए कोई मायने ही नहीं रह गए थे उस वक्त जब किसी ने महसूस कराया कि मैं भी खूबसूरत हूं तो धीरे-धीरे मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आ गया।
आसान नहीं है यह जिंदगी का सफर जिन लोगों पर यकीन किया, उन्हें गिरगिट से जल्दी रंग बदलते देखा है मैंने, मैं हंसती रहती हूं, तो लोगों को लगता है - सब ठीक चल रहा है - पर मेरे चेहरे से कभी भी मेरे दर्द नहीं पढ़ पाओगे क्योंकि मुझे तो गम में भी मुस्कुराने की आदत हो गयी है।