‘नींद हमारी, ख़्वाब तुम्हारे’ के पात्र-पात्री के नाम काल्पनिक हैं, पर घटना मेरे अनुभव पर आधारित है| इसमें कहीं भी मेरी कल्पना की हवाई उड़ान, आपको नहीं मिलेगी| पर हाँ, घटना में रंग भरने की कोशिश मैंने अवश्य की है| मगर ऐसा करते, मैंने इस बात का पूर्णतया ख्याल रखा है, कि कहीं पर भी बेवजह रंग की अधिकता, या न्यूनता नहीं हो, साथ ही किसी भी पात्र-पात्री के साथ शब्दों का चयन करते वक्त बेइंसाफी न हो| जिनको जितना अधिकार प्राप्त है, उतना ही अधिकार मिले, उससे बंचित न रह जाये| इसके लिए, कहानी लिखने बैठने से पहले मैं अपना क्रोध, लोभ, इर्ष्या, दोस्ती, घृणा, तथा पीड़ा इत्यादि को अपने दिल से निकाल देती हूँ, जिससे कि इंसाफ करते, ये सभी इनके बीच दीवार बनकर खड़े न हो जायें और मैं स्वतंत्र होकर लिख सकूँ|
‘नींद हमारी, ख़्वाब तुम्हारे’, एक संतानहीन नारी की व्यथा, कथा है| उसकी व्याकुलता और उसके तड़पते दिल की विह्वलता है| कहानी के पूरी होने बाद, जब मैं इसे पढ़ी, तो मुझे महसूस हुआ कि कहानी के हर छोटे-बड़े पात्र आपस में बातें करते हैं| शब्दों में सजीवता आये, इसकी मैंने यथासंभव कोशिश किया है| पर इस कोशिश में, मैं कहाँ तक सक्षम हो पाई हूँ, यह तो आप पाठक ही बता सकते हैं| ऐसे मैं अपनी परख पर अधिक विश्वास नहीं करती|