कितनी आश्चर्य की बात है, नहीं ! एक रचनाकार कई महीनों या कई वर्ष लगाकर एक पूरी किताब तैयार करता है इसबीच वो कई तरह के अनुभवों से गुज़रता है सहता है लिखता है फ़िर पढ़ता है और पढ़कर फ़िर से परिस्थिति को महसूस करता है । इनसब प्रक्रिया के बीच एक रचनाकार काफ़ी आनंद भी लेता है । पर जब बारी उस किताब का दो-शब्द या भूमिका लिखने कि आती है तो उसे समझ नहीं आता रहता है कि ऐसा क्या लिखूँ जिसमें पुस्तक का निचोर आ जाये ।
हालाँकि, ये संभव नहीं है ख़ासकर एक कवि के लिए क्योंकी कविता प्रत्येक शब्द के साथ व्यक्ति और उस व्यक्ति के परिस्थति के अनुसार ठीक ऐसे ही अपना अर्थ बदलता रहता है जैसे बारिश की बूँदें बरसती तो एक जैसी ही है पर जमीं पर आते ही उस बूँद का उपयोगिता बदल जाता है ।
तो, बिना किसी साहित्यिक भाषणों के आपलोगों एक ऐसे प्रेम के पथ पर ले चलते है जहाँ व्याकरण और वर्णित अशुद्धि रूपी कई कंकर-पत्थर और और न जाने कितने काँटे से होकर गुज़रना परेगा हालाँकि, प्रेम और परेशानी एक-दूसरे का पर्यावाची ही है और वैसे भी ये प्रेम कभी नियम माना कहाँ है !