“था खुदा भी कुछ हैरान उस शख्स की दौलत से,
जो बाज़ार में बस बिना मुनाफे के सौदे करता था !”
रंग कुछ ऐसी ही अभिव्यक्तियों का संकलन हैI माँ की मासूमियत से दफ्तर की दौड़ तक, बचपन की मोहब्बत से जवानी की बेबसी तक, महँगी चीज़ो से भरे घरो से खाली रूह तक, इंसानियत से रूहानियत तक,जिंदगी के हर रंग को छूने की कोशिश है| आखिर में एक छोटा सा प्रयास है कुछ पंक्तियों के जरिए ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को व्यक्त करने का| एक अनुरोध है समाज से, इनके रोजगार और सामाजिक बराबरी के लिए|
क्यूँकी कला में पूरी ताकत है समाज को जोड़ने की|