स्वतंत्रता के बाद से वर्तमान तक लोकसभा चुनाव और राज्य विधानसभाओं के उत्तरोत्तर चुनाव इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत के लोगों में संसदीय शासन प्रणाली के प्रति निष्ठा कायम है। लोकतंत्र का अभिप्राय एक ऐसी शासन प्रणाली से है जिसमें शासन की शक्ति जनता के हाथ में होती है जिसका संचालन वह स्वयं या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से करती है। संसदीय शासन से अभिप्राय उस शासन पद्धति से है जिनमें प्रधानमंत्री व मंत्रीपरिषद अर्थात वास्तविक कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। सरकार के तीनों अंगो में व्यवस्थापिका सबसे महत्वपूर्ण अंग होती है व्यवस्थापिका एक सदनात्मक अथवा द्विसदनात्मक हो सकती है। एक सदनीय व्यवस्थापिका में व्यवस्थापिका का एक सदन होता है जो यूनान बुलगारिया आदि देशों में पायी जाती है। जबकि जिन राज्यों की व्यवस्थापिका में दो सदन होते हैं उसे द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका कहते है। द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका प्रजातांत्रिक शासन के अनुकूल भी है और निरंकुशता पर अंकुश लगाने के अलावा सभी विशिष्ट वर्गों का प्रतिनिधित्व भी करती है। अतः इसे एक सदनात्मक व्यवस्थापिका से अच्छा माना जाता है। भारत में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका को अपनाया गया जिसमें उच्च सदन को राज्यसभा और निम्न सदन को लोकसभा के नाम से जाना जाता है। यह व्यवस्था ब्रिटिश संवैधानिक विकास पर परिणाम है। वर्तमान में सभी बड़े लोकतांत्रिक राज्यों में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका पायी जाती है। इंग्लैण्ड, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैण्ड और भारत सहित द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका वाले राष्ट्र है।