डॉ. तारा, हिंदी साहित्य जगत की एक सफल कथाकार हैं | इनकी बेमिसाल लेखनी के माध्यम से , जब किसी गरीब ,बेवश की आहें फूटती हैं , तब पाठक का मन दर्द से कराह उठता है | कथानक के समस्त पात्र और घटनाएँ काल्पनिक होने के बावजूद, सजीव होकर बातें करने लग जाती हैं | सामाजिक कुरीतियों और विषमताओं को उजागर करती, डॉ. तारा ने, ‘समीरा’ को एक मानवीय रूप ग्रहण कराकर आप पाठकों के समक्ष रखने की कोशिश की है | इस कहानी-संग्रह में कुल उन्नीस छोटी-बड़ी कहानियाँ हैं | इन्हें पढ़ने से ऐसा महसूस होता है, ‘ये सभी कहानियाँ गढ़ी नहीं, बल्कि घटित हुई हैं | काल-प्रवाह में वर्षों से फैला हुआ चौड़ा पाट इन्हें एक दूसरे कहीं नहीं मिलने देता, परंतु विचार में उनकी स्थिति एक नदी तट से प्रवाहित दीपों के समान है| कुछ कम गहरी मन्थरता के कारण,उसी तट पर ठहर जाती हैं, कुछ समीर के झोंके से उत्पन्न-तरंग-भंगिमा में पड़कर दूसरे तट की दिशा में बह चलती हैं , तो कुछ बीच-धार की तरंगाकुलता के साथ एक अव्यक्त क्षितिज की ओर बढ़ जाती हैं | परन्तु दीपदान देनेवाले उन्हें अपनी अलक्ष्य छाया में एक रखते हैं | यही विश्वास डॉ. तारा का भी है |
छोटी बहू शीर्षक कहानी में लेखिका, आज के रिश्तों के गिरते स्तर पर दुखी होकर कहती हैं, ‘कभी इस समाज में श्रवण कुमार और भगवान राम जैसे पुत्र-रत्न भी जनम लिए, जिन्होंने अपने जीवन का हर सुख ,अपने माता-पिता के चरणों में समर्पित कर दिया |’ बीतते युगों के साथ रिश्ते भी बदल और अब तो रिश्ते के सिरे में खून की जगह पानी बहने लगा | ‘लांछन’ शीर्षक कहानी में नारी उत्पीड़न एवं शोषण,उन सीमाओं को लाँघती प्रतीत होती है , मानो नारी नहीं, कोई निरीह पशु हो | कुल मिलाकर समीरा एक उत्कृष्ट कहानी-संग्रह है |