यह पुस्तक 'शब्दों के पार' शब्दों से परे मगर शब्दों की ही नाव पर चल रही मेरी अनकही यात्रा है।
दुःख-सुख,संवेदना,आस्था,विश्वास, ज़िम्मेदारी, आशाएं सपने इन सब अनुभूतियों के मध्य जो भी जीया गया है अब तक, ये वही सारे इंद्रधनुषी रंग हैं जो आज शब्दों के पार उतरे हैं।
मैंने जब जब आँसुओं से घनी अनुभूत चेतना को अपने भीतर कहीं कसमसाते पाया है उसकी मुक्ति हेतु मैंने सिर्फ और सिर्फ लिखने की राह पाई है और उसी से स्वयं को उबरते पाया है।
यों भी हुआ है कभी सारे अंतर्द्वंद्व दिशाहीन हो आपस में ही टकराकर नए रास्ते गढ़ने को चल पड़े हों उस वक्त निश्चित ही मेरे हाथों में मेरी लेखनी रही है।
इसे मैं किताब नहीं अपने उन्हीं नए रास्तों का एक खूबसूरत पड़ाव कहना चाहूँगी जहाँ मैं आज गहनतम आनन्द के बीच ख़ुद को इसी शब्द-अशब्द की महकती छाया तले देख पा रही हूँ और इस सुंदर यात्रा के साथी मेरा परिवार उसी तरावट भरी पुरवाईयों की तरह मेरे साथ चल रहे हैं जो इस पथ पर मेरे लिए प्राण-वायु की तरह आवश्यक हैं।