दिन ब दिन मृत होती संवेदनाएं...रिश्तों का रिसाव...मानवीय जज़्बातों का अभाव और अपने अह्म से ऊपर न उठ पाने की हमारी क्रियाशीलता जब कराती है हमें एकाकीपन का एहसास, तो सहज ही उठ जाती है कलम बोझिल हुए मन को हल्का करने के लिये..। कलम जो अंतरंग मित्र की भूमिका निभाती है...अभावों/तनावों में हमसे घण्टों बतियाती है...। खोलती है ये परत दर परत ह्यस होती अनुभूतियों के राज। जिन्हें बूझते ही व्याकुल हो उठता है हमारा मन और उपजने लगती हैं जीवन के कोरे कागज़ों पर मन की उथल पुथल भावनाएं कभी गद्य/ तो कभी पद्य /गीत/ कविता/ गज़ल/ कहानी तो कभी आलेख के रूप में....। कलम द्वारा उकेरे गए शब्द दर शब्द मेरे भारी मन को बिल्कुल हल्का कर देते हैं । और मैं यथार्थ की धरातल से अनुभवों के पँख लगाकर उड़ जाता हूँ उस क्षितिज की ओर जहाँ निर्मल निश्छल और सात्विक अनुभूतियों के सिवा कुछ भी नही होता...। शीतल जल के छींटे यह मेरा पहला लघुकथा संग्रह है। नागपुर, दमुआ (छिंदवाड़ा) और भोपाल मेरे कर्मक्षेत्र रहे। कार्यक्षेत्रों में सक्रिय रहते हुए विपरीत परिस्थितियों में भी कलम पूरे आत्मबल के साथ मेरा साथ निभाती रही। साहित्यिक मित्रों ने अनेकों बार संकलन निकालने के लिए जोर दिया।पर समय और परिस्थितियां इस ओर कदम बढ़ाने के लिए हमेशा असहयोग ही करती दिखी। वैसे सामूहिक संग्रह चार-पांच आये, लेकिन माँग थी निजी संकलन की जो छोटी बहन नरिंदर कौर बसरा और भांजी रंजीता के निरन्तर उत्साहित करते रहने से ही संभव हो पा रहा है। इस संकलन के कवर पेज से लेकर पूरे प्रारूप को जिम्मेदारी से तैयार करने की भूमिका रंजीता जिसे हम घर में रूबी के नाम से पुकारते हैं ने ही निभाई है। यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि यह संग्रह उसकी एकल मेहनत का परिणाम है।
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