कुछ राज़ से दबे हैं ज़ेहन में। बहुत लोग मौकों की तलाश में है। लफ्ज़ शायद काफी नही होते हर बार लेकिन फिलहाल ज़ेहन के सारे राज़ उस इंसान को बताने की कोशिश की है जिसे अब शायद फ़र्क़ भी नही पड़ता। ये किताब हर उस मोहब्बत के नाम जिसका मुकाम शायद खुदा ने कभी तय ही नही किया था। ये किताब हर उस झुमके के नाम जिसे गैरों की महफ़िल में पहना गया। ये किताब हर उस आशिक़ के नाम जो कहीं न कहीं कहना चाहता है, 'सुनो ना। एक मौका मिलेगा?'