भूमि का प्रश्न आदिवासियों के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका उत्तर औपनिवेशिक काल के इतिहास में छोटानागपुर में हुए कई आदिवासी विद्रोह एवं आंदोलनों के संदर्भ में समझा जा सकता है । भूमि के बिना आदिवासी अस्तित्वविहीन है, भूमि आदिवासी की पहचान है, जिससे उसकी संस्कृति, परंपरा एवं उनका इतिहास जुड़ा है । आरंभ में जब आदिवासियों का छोटानागपुर में प्रवेश हुआ तब उन्होंने इन घने वन जंगलों को साफ कर अपने लिए भूमि तैयार की। यह भूमि प्रकृति प्रदत्त थी इसलिए इस भूमि पर सर्वप्रथम उनका अधिकार था। जहाँ वह अपनी प्राचीन संस्कृति एवं परंपरा का निर्वाह करता हुआ जीवन यापन कर रहा था, परंतु सभ्यता के विकास के साथ ही यहाँ निवास करने वाले मुंडा, उराँव एवं अन्य आदिवासी समुदाय का बाहरी शोषकों द्वारा शोषण किया जाने लगा एवं इनकी भूमि इनसे छीन ली जाने लगी । इसी के प्रतिक्रिया स्वरूप छोटानागपुर के आदिवासियों ने इन शोषकों (दिकू) के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया। उनके पास न तो धन था और न ही कोई बहुमूल्य वस्तु, वास्तव में आदिवासियों के लिए उनकी भूमि ही सबसे कीमती एवं सर्वश्रेष्ठ संपत्ति थी। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के पूर्व से ही छोटानागपुर के आदिवासियों ने अपने जल जंगल ज़मीन की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे कर शासकों को इस विषय पर चिंतन मनन करने एवं उनके लिए भूमि कानून बनाने के लिए विवश कर दिया था। छोटानागपुर के आदिवासियों के लिए भूमि की महत्ता प्राचीन काल से लेकर आजतक बनी हुई है और भूमि से उनका यह विशिष्ट जुड़ाव उन्हें समाज के अन्य लोगों की श्रेणी से पृथक करती है। प्रस्तुत पुस्तक छोटानागपुर के आदिवासियों के आरंभ से भूमि एवं इससे संबंधित विभिन्न आयामों को रेखांकित करते हुए आदिवासियों के जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण कर उनपर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है।
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