हास्यप्रद तथा घनघोर विस्मय पर, आधारित इस उपन्यास के, ज्यादातर खण्ड, दो बेहूदे नवयुवकों की, जीवन शैली को दर्शाते हुए, उन घटनाओं का जिक्र करती है, जब वे दोनों ही बेरोजगार थे, तथा कथानक के, ज्यादातर हिस्सों में, केवल उनके द्वारा, रोजगार को खोजने, व् उनके साथ हुई, कुछ अनाप-सनाप हरकतों को, वर्णित किया है।
घटनाक्रम, निरन्तर उन्हीं दो, पढ़े लिखे बेहूदों के, आसपास ज्यादातर भटकता है। जो निरन्तर नौकरी, पेशा ढूंढने में, लगे हुए हैं, और कई नाकाम कोशिशों के बावजूद, वे काफी समय तक, नाकाम ही घूमते हैं, उपन्यास की पृष्ठभूमि, उस समयकाल को, दिखाने की कोशिश करती है, जब पूरा विश्व मंदी के दौर से, गुजर रहा था, और वे दो, खास हुनर मन्द बेचारे, बेरोजगार थे।
उपन्यास के आखिरी पड़ाव में, वे सफल तो होते हैं, लेकिन जिन दो चरित्रों का, उपन्यास में जिक्र किया गया है, वे वास्तविकता में, होते ही नहीं हैं, वे तो उपन्यास के, किसी तीसरे चरित्र द्वारा, उसके साथ हुई, किसी असाधारण घटना से, उत्पन्न हुई, एक तरह का विकार, या काल्पनिक चरित्र हैं, जिसे उसने वास्तविकता का, एक रूप दे दिया था।
..हालांकि, कहानी खत्म होने के बाद भी, कई ऐसे तत्थों का, खुलासा नहीं करती है, जो कई तरह के, भ्रम को पैदा करते हैं। परन्तु कहानी को, कुछ इस कदर रूख दिया गया है की, कहानी को बिना पूर्ण किये ही, और निरन्तर सम्भ्रम, व् विभ्रान्ति पैदा करते हुए भी, यह कहानी कहीं से, अपूर्ण नहीं लगती, और पाठक स्वयं ही, कथानक के परिणाम तक पहुंच जाते हैं, यही विशेषता ही, इस साहित्य विधा की, एक मात्र कला निधानता भी है।