अपनी स्मृतियों में वो एक-दूसरे को मुस्कुराता हुआ देखना चाहते थे अन्यथा उस मुस्कुराहट के पीछे क्या कुछ बिखर गया था, ये उनका हृदय ही जानता था। उसे ऐसा लगा जैसे उसके ख्वाब जो इतने सालों से वो बुनती आयी है वो साहिल पर पड़ी रेत का कोई महल था जो वास्तविकता के झोंके के साथ ही ढह गया। प्रेम में मात खाई दीक्षा ने न ही पार्थ की तरह अपने मन की व्यथा को किसी से गाया और न ही उससे रुष्ट हुई। उसने बस सच्चाई को अपना लिया और अपनी जिंदा लाश पर सहनशीलता एवं शांति का कफ़न ओढ़ कर खुद को दर्शन बाबू के हाथों में अर्पित कर दिया।
दोनों खड़े रहते हैं वैसे ही मूर्ति बने हुए। न उन्हें भूत याद है, न वो वर्तमान में हैं, न ही भविष्य उन्हें डरा रहा है। इस एक क्षण में उनके लिए जो है यही है। इस दशा को महसूस करने के लिए प्रेम के उस छोर तक जाना होता है जहाँ जाकर ‘मैं’ का सिद्धांत समाप्त हो जाता है। वहाँ सिर्फ ‘हम’ होता है। और इसी ‘हम’ पर दुनिया टिकी है, इस दुनिया में प्रेम टिका है, मैं टिका हूँ, हम सब टिके हैं। इस ‘हम’ को वासना कभी छू भी नहीं सकती, इसके लिए प्रेम के चरम पर होना अत्यावश्यक है।
प्रेम का अर्थ आतुरता नहीं इंतज़ार है। कुछ दिन, कई शामें, अनेकों रातें बड़ी मनहूस होती हैं, आज का दिन, शाम और रात भी ऐसे ही थे। वो खो देना चाहता था खुद को ताकि दीक्षा याद न आए पर जो कण-कण में बसा है उससे कब तक भागा जाएगा?
कई बार कुछ बहुत भयवाह घटित हो रहा होता है। हम फँसे हुए होते हैं पर तभी हमारी आँख खुल जाती है और लगता है, “आश....सपना था।” पार्थ भी सोचने लगा कि काश ये सपना ही हो। वो इंतज़ार करता रहा पर उसकी आँख न खुली, ये सपना समाप्त न हुआ। वास्तविकता थी ये जो खड़ी तांडव कर रही थी उसके सामने।