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"It was a wonderful experience interacting with you and appreciate the way you have planned and executed the whole publication process within the agreed timelines.”
Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Palअद्वैत उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से हैं। प्रारंभ से ही इनकी रुचि कहानियाँ सुनने में रही। जब पढ़ना-लिखना सीखा तब से साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखी गई रचनाओं को पढ़ रहे हैं। समय के साथ ही लिखना भी शुरू हुआ। ग्रामीण पृष्ठभूमि से Read More...
अद्वैत उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से हैं। प्रारंभ से ही इनकी रुचि कहानियाँ सुनने में रही। जब पढ़ना-लिखना सीखा तब से साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखी गई रचनाओं को पढ़ रहे हैं। समय के साथ ही लिखना भी शुरू हुआ। ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के नाते इनकी रचनाओं में गाँव के प्रति असीम प्रेम झलकता है। वर्तमान समय में अद्वैत दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और साहित्य के प्रति गहरा प्रेम रखते हैं।
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जैसे-जैसे मयूर उसकी आँखों को पोंछता, वैसे-वैसे वो और भी रोती। मयूर उसे लगातार चुप होने को कहता पर आपदाओं से ग्रसित धाराएं कभी रुकी भी हैं भला, जो आज रुकतीं।
याददाश्त भी कितनी अद
जैसे-जैसे मयूर उसकी आँखों को पोंछता, वैसे-वैसे वो और भी रोती। मयूर उसे लगातार चुप होने को कहता पर आपदाओं से ग्रसित धाराएं कभी रुकी भी हैं भला, जो आज रुकतीं।
याददाश्त भी कितनी अद्भुत होती है न? कमजोर हो तो समस्या, तेज हो तो और भी समस्या। जाहिर है, हर स्मृति सुखद हो ऐसा आवश्यक नहीं। कमजोर याददाश्त शायद भूल जाए वाकये को पर तेज याददाश्त चलाती रहती है उस दुखद स्मृति को मस्तिष्क के परदे पर जैसे कोई फिल्म चल रही हो। हर दृश्य के साथ दिल बैठता जाता है, मन अंशाति की ओर अग्रसर हो जाता है, पनपता रहता है पछतावे का एक बीज, रक्त का हर कतरा सींचता है उसे। तेज याददाश्त भूलने कहाँ देती है कुछ। भूल जाना भी वरदान है बस फरक इतना है कि उसकी अहमियत से याद रखने वाला ही वाकिफ है। जो बरसों बाद भी बरसों पहले जी रहा है और फँस चुका है उस तिरोहित जाल में वो जानता है भूलना कितना महत्वपूर्ण है।
दिशाहीन सा वो बस दौड़ रहा है। उसकी आँखों से अश्रु फूट पड़े हैं, और पश्चाताप का विशालकाय शिखर उसे सर्वत्र दिखाई पड़ता है। कोई स्पष्ट ख्याल नहीं है उसके मस्तिष्क में। बस बीच-बीच में उसे मंजरी की छवि नजर आती है। वो प्यारा चेहरा जो उस दिन भीगा हुआ था आँसुओं से। कैसे लगी थी वो अचानक से मयूर के अंग। फिर अगले दृश्य में मृदुला तैरती। चलते-चलते वो जाने कहाँ आ चुका था, इसका उसे स्वयं भी भान नहीं था। संकरी गलियों के बीच चलते हुए उसे कई बार लगा कि वो गोल-गोल घूम रहा है। हालाँकि, इस बात से उसे चिंता नहीं हुई, शायद वो खो ही देना चाहता था स्वयं को।
जैसे-जैसे मयूर उसकी आँखों को पोंछता, वैसे-वैसे वो और भी रोती। मयूर उसे लगातार चुप होने को कहता पर आपदाओं से ग्रसित धाराएं कभी रुकी भी हैं भला, जो आज रुकतीं।
याददाश्त भी कितनी अद
जैसे-जैसे मयूर उसकी आँखों को पोंछता, वैसे-वैसे वो और भी रोती। मयूर उसे लगातार चुप होने को कहता पर आपदाओं से ग्रसित धाराएं कभी रुकी भी हैं भला, जो आज रुकतीं।
याददाश्त भी कितनी अद्भुत होती है न? कमजोर हो तो समस्या, तेज हो तो और भी समस्या। जाहिर है, हर स्मृति सुखद हो ऐसा आवश्यक नहीं। कमजोर याददाश्त शायद भूल जाए वाकये को पर तेज याददाश्त चलाती रहती है उस दुखद स्मृति को मस्तिष्क के परदे पर जैसे कोई फिल्म चल रही हो। हर दृश्य के साथ दिल बैठता जाता है, मन अंशाति की ओर अग्रसर हो जाता है, पनपता रहता है पछतावे का एक बीज, रक्त का हर कतरा सींचता है उसे। तेज याददाश्त भूलने कहाँ देती है कुछ। भूल जाना भी वरदान है बस फरक इतना है कि उसकी अहमियत से याद रखने वाला ही वाकिफ है। जो बरसों बाद भी बरसों पहले जी रहा है और फँस चुका है उस तिरोहित जाल में वो जानता है भूलना कितना महत्वपूर्ण है।
दिशाहीन सा वो बस दौड़ रहा है। उसकी आँखों से अश्रु फूट पड़े हैं, और पश्चाताप का विशालकाय शिखर उसे सर्वत्र दिखाई पड़ता है। कोई स्पष्ट ख्याल नहीं है उसके मस्तिष्क में। बस बीच-बीच में उसे मंजरी की छवि नजर आती है। वो प्यारा चेहरा जो उस दिन भीगा हुआ था आँसुओं से। कैसे लगी थी वो अचानक से मयूर के अंग। फिर अगले दृश्य में मृदुला तैरती। चलते-चलते वो जाने कहाँ आ चुका था, इसका उसे स्वयं भी भान नहीं था। संकरी गलियों के बीच चलते हुए उसे कई बार लगा कि वो गोल-गोल घूम रहा है। हालाँकि, इस बात से उसे चिंता नहीं हुई, शायद वो खो ही देना चाहता था स्वयं को।
अपनी स्मृतियों में वो एक-दूसरे को मुस्कुराता हुआ देखना चाहते थे अन्यथा उस मुस्कुराहट के पीछे क्या कुछ बिखर गया था, ये उनका हृदय ही जानता था। उसे ऐसा लगा जैसे उसके ख्वाब जो इतने सा
अपनी स्मृतियों में वो एक-दूसरे को मुस्कुराता हुआ देखना चाहते थे अन्यथा उस मुस्कुराहट के पीछे क्या कुछ बिखर गया था, ये उनका हृदय ही जानता था। उसे ऐसा लगा जैसे उसके ख्वाब जो इतने सालों से वो बुनती आयी है वो साहिल पर पड़ी रेत का कोई महल था जो वास्तविकता के झोंके के साथ ही ढह गया। प्रेम में मात खाई दीक्षा ने न ही पार्थ की तरह अपने मन की व्यथा को किसी से गाया और न ही उससे रुष्ट हुई। उसने बस सच्चाई को अपना लिया और अपनी जिंदा लाश पर सहनशीलता एवं शांति का कफ़न ओढ़ कर खुद को दर्शन बाबू के हाथों में अर्पित कर दिया।
दोनों खड़े रहते हैं वैसे ही मूर्ति बने हुए। न उन्हें भूत याद है, न वो वर्तमान में हैं, न ही भविष्य उन्हें डरा रहा है। इस एक क्षण में उनके लिए जो है यही है। इस दशा को महसूस करने के लिए प्रेम के उस छोर तक जाना होता है जहाँ जाकर ‘मैं’ का सिद्धांत समाप्त हो जाता है। वहाँ सिर्फ ‘हम’ होता है। और इसी ‘हम’ पर दुनिया टिकी है, इस दुनिया में प्रेम टिका है, मैं टिका हूँ, हम सब टिके हैं। इस ‘हम’ को वासना कभी छू भी नहीं सकती, इसके लिए प्रेम के चरम पर होना अत्यावश्यक है।
प्रेम का अर्थ आतुरता नहीं इंतज़ार है। कुछ दिन, कई शामें, अनेकों रातें बड़ी मनहूस होती हैं, आज का दिन, शाम और रात भी ऐसे ही थे। वो खो देना चाहता था खुद को ताकि दीक्षा याद न आए पर जो कण-कण में बसा है उससे कब तक भागा जाएगा?
कई बार कुछ बहुत भयवाह घटित हो रहा होता है। हम फँसे हुए होते हैं पर तभी हमारी आँख खुल जाती है और लगता है, “आश....सपना था।” पार्थ भी सोचने लगा कि काश ये सपना ही हो। वो इंतज़ार करता रहा पर उसकी आँख न खुली, ये सपना समाप्त न हुआ। वास्तविकता थी ये जो खड़ी तांडव कर रही थी उसके सामने।
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