“इस डर से नहीं पढता कि इमोशनल न हो जाऊं” सच कहूँ जब मेरे मित्र ऐसा कहते हैं तो सोच में पड़ जाता हूँ। भीतर खुशी भी होती है कि जो कह रहा हूँ वह दिल और दिमाग को चीर कर पढ़ने वाले को अंतस्तल तक स्पर्श कर रहा है । जिंदगी एक लाइव परफारमेन्स है । यहां जो कुछ हुआ उसका रिपीट टेलीकास्ट नहीं होता । यह जिंदगी किसी हसीन फिल्म की तरह है , बस फर्क यह है कि यहां आपको अपने सींस के शॉट री टेक का मौका नहीं मिलता।
सो न जाने क्यों जब भी कुछ कहता हूँ तो मुझे भी नहीं पता होता कि , कह क्या रहा हूँ यह लाइफ कोई स्क्रिप्टेड तो है नहीं कि किसी राईटर डायरेक्टर ने मुझे बता दिया , स्टेज पर जाओ कैमरे के सामने खड़े हो और यह एक्टिंग करते हुए ऐसे डायलाग बोल दो । हमें बहुत बार लगाता है कि , घटनाएं रिपीट हो रही हैं जैसे “हिस्ट्री रिपीट इट सेल्फ” लेकिन ऐसा होता नहीं है क्योंकि वक्त अभी निगेटिव एक्सिस पर प्लॉट नहीं होता।
देखिये , कविता, कहानी, व्यंग्य , उपन्यास आदि मै लिखता हूँ उसे कहता नहीं हूँ । लिखने और कहने में फर्क है , लिखता हूँ तो कहीं न कहीं कुछ होता है जिसे संस्कार में बाँध देता हूँ , जैसे कविता , कहानी और व्यंग्य के अपने संस्कार होते हैं जो भाव व कैरेक्टर के साथ चलते हैं , लेकिन कहने में कहीं कुछ होता ही नहीं , इसलिए मुझे पता ही नहीं होता कि कह क्या रहा हूँ , बस कहता चला जाता हूँ और मज़ा यह कि मेरे बिना कुछ कहे भी आप वह पढ़ लेते हैं जो मैने कहा । शब्द ही तो हैं जो पढ़ रहे हैं और मै कहता जा रहा हूँ , बात आपके दिल को सुनाई दे रही है। पढ़ तो आपकी आँखें रही हैं और सुनाई दिल को दे रहा है।