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Shankar-Saakshaat / शंकर-साक्षात्

Author Name: P. Janardan Rai Nagar | Format: Hardcover | Genre : Religion & Spirituality | Other Details

जगद्गुरू शंकराचार्य- शंकर के जीवन वृत को आधार बनाकर पण्डित जनार्दन राय नागर द्वारा लिखे गये दस उपन्यासों में यह ‘‘शंकर साक्षात्’’ है। इस उपन्यास का कथानक आत्म जन्य है। जिसमें ज्ञान से ज्ञान की, सिद्धियों से सिद्धियों की टकराहट है। सम्पूर्ण चित्र में ‘‘मैं’’ की खोज है। परम् शिवत्व के प्रथम दर्शन शंकर को कंदरा में होते हैं। शंकर गुरू गोविन्दपाद के साथ ऊपर उठता है। शंकर को विश्वनाथ के दर्शन करवाये। शंकर पूर्णत्व के अन्तिम सोपान पर सदा के लिए स्थित हो गये। विश्वोत्तीर्ण के साथ विश्वात्मा हो गये। पराशक्ति से तादात्म्य लाभ प्राप्त कर वे पहुंच गये, जहां पहुंचना था- ‘‘शंकर से शंकर साक्षात् हो गये’’

इस उपन्यास में ज्ञान व भक्ति का समन्वय है। इसमें लेखक-ज्ञानी भक्त नहीं होता- इस भ्रान्त धारणा का खण्डन करते हैं। शंकर का ज्ञान, क्रचक्र का अज्ञान, कुमारिल्ल का शिव संकल्प, मण्डन का अभिमान उपन्यास को विचार मंथन से आलोकित करता है। इस प्रकार यह उपन्यास अनिर्वचनीय, अकथनीय, निरामय, निर्वाणमय, अपार, आरपार, केवल एकमेव एकाकार, रूपहीन, नामहीन ‘‘ब्रह्म’’ साक्षात्कार की पथगाथा है।

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पं. जनार्दन राय नागर

पं. जनार्दन राय नागर का जन्म उदयपुर में 16 जून, 1911 ई. को हुआ। बहुआयामी प्रतिभा के धनी पं. नागर ने शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति व समाज सेवा आदि क्षेत्रों में अपनी अमिट कीर्ति स्थापित की। गाँधीवादी संस्कारों से दीक्षित व कथा सम्राट प्रेमचन्द्र के आशीष पात्र रहे जनार्दन राय नागर ने मेवाड़ में शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से सन्  1937 में हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना रात्रिकालीन संस्थान के रूप में की। पं. नागर की सतत तपस्या के परिणाम स्वरूप इस संस्था की  उत्तरोत्तर प्रगति हुई। वर्तमान में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर,  वटवृक्ष के रूप में स्थापित है।

शिक्षा की लोक साधना में लीन जनार्दन  राय नागर की ऐकान्तिक साधना साहित्य-सृजन के रूप में निरन्तर गतिमान रही। उन्होंने उपन्यास, कहानी, गद्य-गीत, जीवन चरित्र व काव्य विधाओं में लेखन किया। उनके कि 5,500 पृष्ठों में समाहित  दस उपन्यासों की श्रृंखला है, जो हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनके ‘राम-राज्य’  के पांच उपन्यास प्रकाशित हो चुके है। चार गद्य-गीत संग्रह, नागर की कहानियां शीर्षक से दो कथा-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनके नाटक ‘आचार्य चाणक्य’, पतित का स्वर्ग’, ‘ऊदा हत्यारा’, ‘जीवन का सत्य’, अत्यन्त चर्चित रहे तथा मंचित भी हुए।

पत्रकारिता के क्षेत्र में पं. नागर ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं की स्थापना, संपादन व संचालन में योगक्षेम निर्वहन किया। ‘मुधमती’, ‘स्वर मंगला’, ‘नखलिस्तान’, ‘बालहित’, ‘कल्कि’, समाज शिक्षण’, ‘शोध पत्रिका’, ‘वसुन्धरा’, ‘जन मंगल’, ‘जन सन्देश’ व ‘अरावली’ आदि पत्रिकाएं उनकी कीर्ति पताकाएं हैं।

राजस्थान साहित्य अकादमी के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने राज्य में साहित्यिक उन्नयन व मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह की। वे केन्द्रीय साहित्य अकादमी, हिन्दी सलाहकार समिति (रेल्वे), केन्द्रीय प्रौढ़ शिक्षा सलाहकार समिति आदि के मनोनीत सदस्य रहे। विधानसभा में मावली क्षेत्र से विधायक रहे। उन्हें ‘नेहरू साक्षरता पुरस्कार’ व ‘महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन पुरस्कार’ सहित अनेक राष्ट्रीय  सम्मान प्राप्त हुए। इस यशस्वी व्यक्तित्व का 15 अगस्त, 1997 को उदयपुर में निधन हुआ।

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