सामाजिक मुद्दे, वो हैं जो एक समाज में कहीं ना कहीं सभी लोगो को प्रभावित करते हैं। कुछ लोग इसे सुधारने में अपनी ज़िन्दगी लगा देते हैं और कुछ ख़ामोशी से अनदेखा करके सहते जाते हैं। मेरी इस कोशिश में मेरे कई साथी जुड़ गये और अपनी कलम के ज़रिये अपनी आवाज़ बुलंद की, ये किताब महज़ लफ्ज़ो का तनाबना नहीं है बल्कि मज़लूम के हक़ में उठाई गयी बुलन्द आवाज़ है। अपनी कलम का हक़ अदा करते हुए इस में दहेज प्रथा, महिलाओं के खिलाफ घरेलू या यौन हिंसा, साम्प्रदायिक दंगे, शारीरिक विकलांगता, बाल यौन शोषण, गरीबी, अशिक्षा, लिंग असमानता वगैरह मुद्दों पर अपनी बात कविता, छंद और ग़ज़लों के ज़रिये कही गयी है।
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