#‘‘स्तुति तो वह करने से रही?’’ इसलिए उसने वही पुराना राग- “हिंदू देवी और देवताओं को कोसने का मन बना लिया।” विचार के जेहन मेें उतरते ही गौतमी ने उस पर अमल कर दिया। उन्
हे बेमतलब ही गरियाने वाली थी कि विद्यु युत गति से एक दू सरा विचार उसके मन मेें कौंधा। शायद आज भगवान को भी गाली सुनने का मन नही था या फिर उसकी अपनी आत्मा अपने परमात्मा को और अधिक लज्जित होते नही देख पा रही थी। शायद इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप यह विचार कौंधा हो...???
‘‘अह्म ब्रह्मास्मि’’ का विचार। वह खुद ही ब्रह्म है।’’
‘‘अह्म अल्लास्मि” का विचार। वह खुद ही खुदा है।’’
‘‘वह स्वयं मेें गॉड है, परमेश्वर ईशा मसीह है।’’
‘‘वह वाहे गुरू भी है और बुद्ध का अवतार गौतमी भी।’’
‘‘वह खुद ही अहुरा मज़दा है।’’
#अल्लाह की आस्था ने उसे विकलांग बना दिया था। मन से और तन से। फिर भी वह नही आया? एक विकलांग व्यक्ति की मदद को वह नही आया? वह तो उसके घमंड मेें पंगु बन गई थी।आस्था का ज्वार चढा था उस पर। विश्वास का चोगा पहनकर घर से निकली थी। अल्लाह की आभा की छतरी मेें चल
रही थी वह। फिर झुलसी क्यों? झुल सी क्या पूरा तन-मन ही जल गया। फिर धोखा क्यों? फिर आस्था पर वज्रपात क्यों? इकरा के मन मेें पैदा हुई हलचल अब सुनामी का रूप इख्तियार करती जा रही थी।
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