अपने ही बुने एकान्त में एक ऐसे मनुष्य की काव्य-यात्रा है जो भीड़, शोर और दिखावों के बीच खड़े होकर अपने भीतर एक गहरा एकान्त बुनता है। यह एकान्त न तो पलायन है, न ही अकेलेपन की शिकायत—बल्कि आत्मसंवाद का वह ज़रूरी क्षण है जहाँ मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है, अपने समय से टकराता है और अपने अनुभवों को शब्द देता है।
इस कविता-संग्रह में प्रेम की कोमलता है, स्मृतियों की टीस है, सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं की चुप लेकिन तीखी आलोचना है, और समय के साथ बदलते मनुष्य का एक संवेदनशील चित्र भी। कवि यहाँ उपदेश नहीं देता, बल्कि घटनाओं, अनुभूतियों और अंतर्द्वंद्वों को इस तरह रखता है कि पाठक स्वयं अर्थ खोजने को विवश हो जाए।
भाषा सरल है, पर भाव गहरे हैं। ये कविताएँ तात्कालिक प्रभाव से अधिक दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ती हैं—ऐसा प्रभाव जो पढ़ने के बाद भी भीतर गूंजता रहता है। संग्रह उन पाठकों के लिए है जो कविता को केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामाजिक सजगता का माध्यम मानते हैं।
अपने ही बुने एकान्त में पाठक को अपने ही भीतर बुने हुए एकान्त से रूबरू कराता है—जहाँ सवाल हैं, असहज सच्चाइयाँ हैं, और कभी-कभी उत्तर से अधिक मौन की सार्थकता है।