आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के प्रबल प्रवाह में दशनाम गोस्वामी समाज की गौरवशाली परंपराएँ धुंधली पड़ती प्रतीत हो रही हैं। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक चेतना के लिए गंभीर संकेत है। यदि जड़ों से संबंध टूट जाए, तो वटवृक्ष की छाया भी टिक नहीं पाती। इसी संवेदना और उत्तरदायित्व-बोध से प्रेरित यह ग्रंथ रचा गया है। यह पुस्तक केवल अतीत की घटनाओं का वर्णन नहीं करती। इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनके गौरवशाली इतिहास और महान परंपराओं से परिचित कराना है। यह उन्हें उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकार, शास्त्रों पर आधारित जीवन-मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा को समझने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, यह अद्वैत की उज्ज्वल जीवन-दृष्टि से उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास है, ताकि वे अपने समाज और संस्कृति पर गर्व महसूस करें। यह कृति एक आह्वान है अपने मूल की ओर लौटने का, अपने कर्तव्य को पहचानने का, और उस तेजस्वी सांस्कृतिक ज्योति को पुनः प्रज्वलित करने का, जिसने सदियों तक धर्म और ज्ञान को आलोकित किया। विश्वास है, यह पुस्तक नई पीढ़ी में स्वाभिमान, समर्पण और जागरण की प्रखर चेतना जगाएगी।