नैना के बाबूजी यदि अपने परिवार के लिए एक आशियाना बनाकर स्वर्गवासी होते, तो शायद यह कहानी कुछ अलग लिखी जाती। ‘अपना घर’ और ‘सिर पर छत’ प्रत्येक वर्ग के भारतीयों का खुली आँखों से देखा गया स्वप्न है।
कहानी का प्रारंभ नैना के बाबूजी से हुई इस चूक से होता है, किन्तु सरपट भागती ज़िंदगी जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूती हुई आगे निकलती जाती है। नैना की वास्तविकता विश्व के नब्बे प्रतिशत परिवारों की कथा हो सकती है, किन्तु नैना कुछ अलग थी। वह एक सुशील, सभ्य और संस्कारी लड़की थी, परंतु घृणा, प्रतिशोध और उम्र की चंचलता का वेग सूक्ष्मतम मार्ग मिलते ही बाहर निकल आता है।
नैना को अपनी माँ से अथाह प्रेम था, किन्तु एक बार अलग हो जाने के पश्चात वह लौटकर माँ के पास नहीं गई। यह नैना का एक अक्षम्य अपराध था। उसके अपने तर्क उसकी कायरता थे।
संभवतः नैना के माता-पिता के पुण्य थे कि उसे ईश्वर और समाज का साथ मिला। नकारात्मक विचारों से पूर्ण लड़की भी सबको प्रिय लग सकती है—यह इस पुस्तक की नायिका की अद्भुत क्षमता और नवीनता है।
पुस्तक का प्रवाह गति बनाए रखता है। भाषा की जटिलता कोई रुकावट नहीं बनती, बल्कि भावनाओं को समझने का माध्यम बनती है। नैना के व्यक्तित्व का चित्रण लेखिका ने तटस्थ रहते हुए आदर के साथ किया है। नैना करुणा, दया अथवा उपेक्षा की मोहताज नहीं है।