भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य की परंपरा सदा से रही है, जहाँ गुरु को एक अत्यंत सम्माननीय स्थान प्राप्त है | हमारी परंपरा में गुरु का सम्मान भगवान के पूर्व करने की बात कही गई है, क्योंकि गुरु के बिना तो हमें यह ज्ञान नहीं हो सकता कि भगवान हैं कौन?
पूर्व समय में गुरु जन अपने कर्तव्य का निर्वहन उचित ढंग से करते थे और शिष्य भी बहुत आज्ञाकारी हुआ करते थे | इस प्रकार यह संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण था |
किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह पवित्र प्रणाली एक सीमा तक समाप्त हो चुकी है | बाकी संबंधों की भाँति इस संबंध पर भी आधुनिकता की छाप पड़ चुकी है | अब इस संबंध में भी लोलुपता और लोभ ने अपना स्थान बना लिया है |
इसी आधुनिक गुरु-शिष्य प्रणाली पर आधारित यह वास्तविक घटना का सारांश रूप दिव्या जी ने इस पुस्तिका में वर्णित किया है | जहाँ दिया नामक नायिका के जीवन में उसके एक गुरु के व्यवहार का दुष्प्रभाव पड़ता है |