काठगोदाम की गर्मियाँ – 2 केवल कविताओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह स्मृतियों, संवेदनाओं और रिश्तों की उन गहराइयों का दस्तावेज़ है जिन्हें शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं। लेखक धीरेन्द्र सिंह बिष्ट ‘धीर’ की लेखनी पहाड़ों की सादगी, कस्बों की ख़ामोशी और जीवन की अनकही कहानियों को जीवंत कर देती है।
इस संग्रह की कविताएँ कभी प्रेम की नर्मी को छूती हैं, तो कभी वियोग की तीखी चुभन को उजागर करती हैं। कहीं अकेलेपन की परछाई है, तो कहीं आत्म-खोज की उजली परतें। इसमें पाठक नायक या नायिका नहीं पाएगा, बल्कि अपनी ही भावनाओं से मुलाक़ात करेगा।
हर कविता एक ठहरी हुई चिट्ठी की तरह है—स्याही धुंधली हो सकती है, मगर भावनाएँ ताज़ा रहती हैं। इन पंक्तियों में काठगोदाम की गलियों की गूंज, भीमताल की झील का ठहराव और हल्द्वानी की सुबह की धड़कन हर जगह महसूस होती है।
लेखक की विशिष्टता यह है कि वे कविताएँ नहीं गढ़ते, बल्कि उन्हें जीते हैं। यही कारण है कि पाठक इन रचनाओं को पढ़ते नहीं, बल्कि उनमें खुद को खोजते हैं।
यह पुस्तक उन सभी के लिए है, जो शब्दों के बीच की खामोशी को महसूस करना जानते हैं और जो कविताओं में अपने बीते हुए लम्हों की झलक ढूँढते हैं।
“काठगोदाम की गर्मियाँ – 2” आत्मीयता और संवेदनशीलता का ऐसा संग्रह है, जो आपको न केवल पढ़ने बल्कि भीतर तक महसूस करने के लिए आमंत्रित करता है।
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