"कुछ तो बाकी है" इस किताब के माध्यम से संकलनकर्ता ने सह-लेखको को, अपने मन की बात रखने का मौका दिया है कि, सब कुछ करने के बाद भी कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो बाकी रह ही जाता है, इस किताब में सह-लेखकों ने अपनी- अपनी कविताओं में बताया है कि, इतना प्रयास, इतना सब कुछ मिलने के बाद भी," कुछ तो बाकी है" दिल, और दिमाग, में फिर भी कुछ ना कुछ तो बाकी रह जाता है, कोई ख्वाहिश, कोई ख्वाब, किसी का प्यार, तो किसी का परिवार, कुछ भी संपूर्ण नहीं मिलता, कुछ तो बाकी रह ही जाता है, एक ना एक अरमान सबका अभी बाकी है "कुछ तो बाकी है"।