यथार्थवादी उपन्यास की परम्परा का उपन्यास। खुले में शौच की समस्या और शौचालय के इर्द-गिर्द घूमती सुरेश-सुनयना और कलुआ-कल्लो की प्रेम कहानी। यह उपन्यास ग्रामीण महिलाओं, जिन्हें खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है और सभी तरह की कठिनाइयों एवं अपमान को सहना पड़ता है, की शताब्दियों पुरानी समस्या का उद्घटन करता है। राम वचन, हेड मास्टर, सुरेश बाबू, सुनयना, कलुआ, कल्लो, कर्नल, काकी, सुंदरिया, नयकी, हरिया, छगन, भूरे जैसे पात्र पाठकों को गुदगुदायेंगे, हंसायेंगे, सोचने को विवश करेंगे और भावनाओं के सागर में गोते लगवायेंगे।