कविताएं हैं, कुछ लेख हैं, कुछ गाने हैं और एक कहानी है। और भी बहुत कुछ होगा जो शायद मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूँ। वो समझना तुम्हारा काम है।
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सबा ए मौत चलती है मेरी जीवन की पतंग के पीछे।
डोर जहान नहीं है। डोर समाज है।
कटने के बाद ना जाने किस किस तरह मौत मुझे उछाल रही है गिरा रही है झूला रही है।
ज़मीन तक पहुँचा ही देती है, फिर उठा लेती है, एक दम से दिखा देती है कि हवा पेड़ उखाड़ती तो है ही पर पतंग भी उड़ाती है।
साँस भी देती है। डोर कटने के बाद ज़मीन से दूर भी रखती है।
मेरी सज़ा ए ख़ौफ़ का जवाब है सबा ए मौत।
मेरे उठने के बाद का ख़्वाब है सबा ए मौत।
(इस कत्ल ए आम से)
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