'सागर मंथन' की घटना सनातन संस्कृति में एक विशेष महत्व रखती है। सनातन संस्कृति में निसंदेह रामायण एवं महाभारत सर्वाधिक महत्वपूर्ण महागाथायें हैं परंतु सनातन संस्कृति सदैव से ही ऐसी अनगिनत पौराणिक महागाथाओं से समृद्ध रही है, उन्हीं में से एक अभूतपूर्व घटना 'सागर मंथन' है। प्राचीन समय में किसी बात से क्षुब्ध होकर दुर्वासा ऋषि ने देवराज इंद्र को श्राप दे दिया जिसके फलस्वरूप उनका स्वर्ग सिंहासन चला गया तथा देव शक्तिहीन हो गए, तब देवों ने श्री नारायण को याद किया जिन्होंने पुनः शक्ति प्राप्त करने हेतु अमृत पान का सुझाव दिया जो 'सागर मंथन' से प्राप्त होना था, परंतु सागर मंथन से सर्वप्रथम विष 'हलाहल या कालकूट' प्राप्त हुआ जिससे यह दाँव उल्टा पड़ गया तथा जिसके प्रकोप से सम्पूर्ण सृष्टि प्रलय के मुहाने पर आकर खड़ी हो गई। तब देवों ने परम शक्तिशाली महादेव का स्मरण किया जिन्होंने उस हलाहल विष को अपने कंठ में धारण करके सृष्टि को प्रलय से बचाया। तात्पर्य यह है कि जब भी आप किसी परेशानी में होते हैं तो आप उस परमशक्ति का स्मरण करते हैं जो आपकी समस्त पीड़ाओं को हर लेते है तथा आपको निर्विघ्न जीने की स्वछंदता प्रदान करते हैं। उक्त अभूतपुर्व घटना को कालांतर के क्रम में इस खंडकाव्य में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।