"शायद ये शायरी नहीं - बस कुछ एहसास हैं, जो शब्दों में आ गए।"
कभी वो PCO जहाँ दिल कॉल करता था…
कभी शहर जो घर ना बन सका, या घर जो अब अजनबी लगता है।
कभी बुतख़ाना - जहाँ जज़्बात सजते हैं, मगर सुनने वाला कोई नहीं।
‘रेत, शहर और थोड़ा शहद’ उन लम्हों की किताब है जो आज के शोर में कहीं दब गए हैं।
अगर आपने कभी किसी से मोहब्बत की है, या अपने आप से -
अगर पुराने ज़माने की सादगी और आज के रिश्तों की उलझन आपको छूती है -
तो ये किताब सिर्फ पढ़ने की नहीं, महसूस करने की है।
इसे खुद को या किसी ऐसे को दीजिए, जो सुनना भूल गया है।
शायद इन पन्नों में कोई ऐसी बात मिल जाए जो दिल में ही अटकी थी।
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