एक फ़र्क रहना चाहिये।
एक फ़र्क रहना चाहिये,
तेरी करनी और मेरी करनी में,
एक फ़र्क रहना चाहिये।
एक फ़र्क रहना चाहिये,
तेरे कहने और मेरे कहने में,
एक फ़र्क रहना चाहिये।
मैं सदा यहीं नहीं रहूँगा,
तेरी जर्नी और मेरी जर्नी में,
एक फ़र्क रहना चाहिये,
“मानुज” का जीवन एक हलचल है,
तेरे जीने और मेरे जीने में,
एक फ़र्क रहना चाहिये।
गुप-चुप, छोटा मरने में कौन सा हल है?
तेरे मरने और मेरे मरने में,
एक फ़र्क रहना चाहिये।
“मानुज” के गीतों में आपको, जीवन की मुश्किल घड़ी में अकेले खड़े होने की प्रेरणा मिलेगी, निराशा से आशा की ओर बढ्ने की प्रेरणा मिलेगी। आप अकेले ही बड़े से बड़े तूफ़ानों से लोहा लेने की प्रेरणा इन गीतों से पाएंगे। कहीं पर आपको ज्वलंत विश्वास नज़र आएगा, अपने लक्ष्य के प्रति अथाह समर्पण आप देखेंगे। आप पाएंगे कि जब जीवन में सब कुछ शून्य नज़र आता है और कोई संभावना नहीं दिखती, उस एक पल में भी आशा और संभावनाओं की शक्ति से जीवन कैसे बदल सकता है, वो आप देख सकेंगे। साथ ही देशप्रेम, अध्यात्म, मनोविज्ञान, दर्शन, बचपन और गाँव की मिट्टी की खुशबु से प्रेरित गीत और रचनाएँ भी आपको मिलेंगी, जिनमें हर्ष और विषाद के क्षणों का भाव भी आपको एक नई दृष्टि में नज़र आएगा। कवि विचारों के गहरे सागरों मे जाकर मोती ढूँढ लाता है। “मानुज” की रचनाओं में आप प्रेम के प्रति सर्वस्व समर्पण को देख पाएंगे। एक नए तरह का प्रेम। “ये माटी मेरे देश की है” व “मैं छाया छूने निकला हूँ” नामक ये पुस्तक अपने तरह की एक बहुत ही ख़ास पुस्तक है। आप बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकेंगे। कुछ रचनाएँ आपके दिल को झकझोर देंगी। आपकी आँखों में भी कुछ चित्र उभर आएंगे और आप अनचाहे ही उस दुनिया को महसूस कर सकेंगे जिसमें कवि आपको ले जाना चाहता है और आप अपने जीवन की कहानी याद करने के लिए मजबूर हो जाएँगे।
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