मन के भँवर में

pancholi.rekha
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*मन के भँवर में* रेखा पंचोली


मैं अपना सूटकेस हाथ में लिए डिब्बे में चढ़ा ही था, कि तेज सिटी की आवाज के साथ गाड़ी ने रेंगना शुरू कर दिया | पत्नी और बेटे को बॉय कर मैं सीट तलाशने लगा ,सैकण्ड ए.सी. का डिब्बा होने के कि वजह से अधिक भीड़ -भाड नहीं थी, सीट आसानी मिल गई | मैने अपना सामान सीट के नीचे रखा और पर्दा खींच कर आराम से बैठ गया |

कहते हैं .... सह यात्री अगर अच्छा हो सफ़र ज्यादा अच्छा हो जाता है,अब सह यात्री पर मेरा नजर डालना लाजमि था |


सामने कि सीट पर एक खूबसूरत हसीन-जहीन सी 24-25 बरस की युवती बैठी थीं,बड़ी -बड़ी झील सी आँखे ....आफताब सा गोल चेहरा ..चम्पई गोरा रंग ..सांचे में ढला... भरा-भरा बदन ...तिस पर लाल रंग का जरी वाला सलवार -कमीज ...उफ़ बला की खूबसूरत! मन कह उठा वाह !! क्या बात है ये सफ़र तो अच्छा क्या सुहाना कटेगा ! मन ने अपने रिकार्ड प्लेयर तरह-तहर के गाने बजाने शुरू कर दिये...मसलन *ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा ... * लाल छड़ी मैदान खड़ी...


मेरी उम्र 50-55के लग-भग है... मगर क्या करूँ ये मन अभी भी 25 बरस का खिलंदड है ,शायर का मन जो ठहरा | अभी भी एक मुशायरे में बतोैर शायर शरीक होने जा रहा हूँ | उसने अपने बालों को समेट कर बांध लिया था ...पर एक नट-ख़ट; लट इस बंधन से छूट आई थी ...और अपनी जीत का जश्न मनाती सी कभी उसके ओैठों से तो कभी भवंर पड़े गालों को छू रही थी ...इस खूबसूरत नज़ारे पर अब तक मेरी एक गजल भी बन कर तैयार हो गई थी | मैं उससे बात करने और दोस्ती गाँठने के तरीके सोच रहा था |
मैंने पूछा-आप कहाँ जा रही हैं ? जी ! मुंबई... संक्षिप्त सा जवाब उधर से आया....नजरें किसी पत्रिका में गड़ी थीं |
पर मै उत्साह से लबरेज था ,मै भी मुंबई जा रहा हूँ ...क्या है कि वहां मुझे एक मुशायरे में आमंत्रित किया गया है ..."वैसे तुम वहां कैसे जा रही हो ? "मुझे आपसे तुम पर आने में जरा भी वक्त नहीं लगा था मै बात को पूनी की तरह खींच कर लम्बा सूत कातने की फ़िराक में था |
"जी !वहां मेरे इंग्लोज रहते हैं | "
आपके साथ और कौन है ? "जी कोई नहीं ... पति आ जायेंगें लेने स्टेशन पर ।"
हम्म ! तो मोहतरमा अकेली हैं! मेरा मन अपने में ही मुस्कुराया ! मेरे होैसले बुलंद हो रहे थे ...मैं बातों का सिलसिला जारी रखे था | अब तो वो भी बीच-बीच में मेरी और देख लेती थी| ये तो सोने पर सुहागा था ...मुझे लग रहा था कि अब वो भी मुझ मैं रूचि ले रही है | अब मै उसे प्रभावित करने के पुरजोर प्रयास कर रहा था| अभी-अभी उसकी तारीफ मै लिखी ताजा-तरीन गज़ल भी उसे सुना देना चाहता था | मन कहता है -आज का दिन बड़ा लक्की है | वह सागर की उत्तंग लहरों सा उछालें मार रहा है ....मेरा ये मन लहरों सा चंचल है.... और वैसा ही संतोषी भी....लहरें किनारों से जो कुछ पा लेती हैं ....उसे ही अपने दामन में सहेज लेती हैं किनारों के बंधन तोड़ती नहीं | मन लहर सा किनारे की और बढ़ता है ....मैं अपना पैर उसकी और बढाता हूँ ताकि पैर उसके पैर से छू जाये .... पैर छू जाता है...रोमांचित हो उठता हूँ मैं ....अचानक उसका ध्यान इस और जाता है ...वह नीचे झुकती है ...और मेरे पैर छू लेती है !
"सॉरी !अंकल आपको पांव लग गया |"
सब्ज बाग के आसमां पर उड़ता हुआ, मैं धड़ाम से नीचे गिरता हूँ !...पर मन को इतने ऊपर से गिरना कतई मंजूर नहीं ss वह चिहुँक कर कह उठता है - नहींssss ! नहीं गिरना मुझे इतनी ऊंचाई से नहीं गिरना ! और वो खुजूर की टहनी पकड कर लटक जाता है ...
वो मधुर आवाज फिर गूंजती है ।"अंकल !कहीं आप खुशबू के पापा तो नहीं ? खुशबू !मेरी बचपन की सहेली.... हम एक साथ एक ही स्कूल में पढ़े ....अब तो अरसा हो गया उससे मिले ..... खुशबू के पापा भी गजलें लिखतें हैं ...वो अकसर अपने पापा की गजलें कॉपी में लिख कर लाया करती थी और हमें पढ़ कर सुनाया करती थी|"मेरे हाथ से खजूर की वो टहनी भी छूट जाती है .....मैं धराशायी हो जाता हूँ ....!
इस बार मन को कोई एतराज नहीं है मेरे धरती पर गिरने से ....मैं उसे कातर दृष्टि से देखता हूँ पर वो व्यंगात्मक दृष्टि से देखता है। मैं हैरान हूं सब कुछ इसका ही तो किया धरा था ..... वह यहीं नहीं धृष्टता से कहता है- "धरती तुम फट जाओ ....तो और भी अच्छा रहेगा ...इस अहमक को तो रसातल में गिरना चाहिये....! "
मै गिरगिट की तरह रंग बदलते अपने दोैगले मन को हैरानी से देखता हूँ ....और टूटती बिखरती आवाज मै कहता हूँ -"हाँ बेटी ! तुम्हारी.... सखी.... खुशबू.... मेरी ही बेटी है ।"

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