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"It was a wonderful experience interacting with you and appreciate the way you have planned and executed the whole publication process within the agreed timelines.”
Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Pal
समयलाल विवेक की कविताएँ हमें गाँव-कस्बों के उन दृश्यों से जोड़ती हैं, जिन्हें हम विस्मृत करते जा रहे हैं अथवा ग्रामीण विकास के छद्म आवरण में जिन्हें देखने का जज़्बा हम खो बैठे ह
समयलाल विवेक की कविताएँ हमें गाँव-कस्बों के उन दृश्यों से जोड़ती हैं, जिन्हें हम विस्मृत करते जा रहे हैं अथवा ग्रामीण विकास के छद्म आवरण में जिन्हें देखने का जज़्बा हम खो बैठे हैं। विवेक की कविताओं के केन्द्र में वे ग्रामीणजन, मजूर किसान हैं, जो नितांत वंचित उपेक्षित हैं और नितांत पिछड़े हैं। विवेक की अपनी शख्सियत और उनकी कविताओं में कोई अंतर नहीं है। वे जैसे विनम्र सहज सरल हैं, वैसे ही उनकी कविताएँ भी विनम्रता सहजता सरलता से हमारे पास आतीं हैं। उनकी कविताओं में आर्थिक सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव और ग्रामीण शोषण को लेकर गहरी बेचैनी है। वे अपने आसपास की असमानता, शोषण देखकर व्यथित, कहीं–कहीं आक्रोशित हो जाते हैं। किंतु उनकी व्यथा, उनकी बेचैनी बगैर किसी शोर-शराबे के तकरीबन उनकी हर कविता में नितांत स्वाभाविक रूप से, किंतु पूरी शिद्दत से, उतरती है। यही शिद्दत पाठक को भी अंदर कहीं गहराई में बेचैन और व्यथित कर जाती है। वे सवाल करते हैं कि दुनिया में कहीं तरक्की हो रही है, कहीं असमानता कम करने का प्रयास हो रहा है, तो यह उनके समीप के वंचित जन तक क्यों नहीं आ रहा ? वे उन्हें भी अच्छे से जानते पहचानते हैं, जो इस तरक्की और प्रयास को अपने ही तक रोके बैठे हैं। अपनी कविताओं में वे उम्मीद जताते हैं कि इस व्यवस्था को गैर-बराबरी की ओर ले जाना और वंचित-शोषित-पिछड़े जन को उनका वाजिब हक दिलाना मुश्किल जरूर है, पर असंभव नहीं है।
यह उनकी अतिशय विनम्रता ही है कि एक कविता में वे खुद को पीपल का सूखा पत्ता बताते हैं और कामना करते हैं कि काश! उनका हरापन लौट आता और वे किसी गर्भवती बकरी का आहार बन पाते। जबकि उनकी कविताओं और खुद उनमें हरापन अभी बचा हुआ है।
नीरज मनजीत
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