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डॉ. डी. के. वर्मा बौद्ध साहित्य के सुविख्यात विद्वान एवं गहन अध्येता हैं। उन्होंने भगवान बुद्ध के मूल उपदेशों का गहन अध्ययन, विश्लेषण एवं संदर्भात्मक विवेचन करते हुए उन्हें सरल, सुबोध और पाठक-अनुकूल रूप में प्रस्तुत करने का कार्य Read More...
डॉ. डी. के. वर्मा बौद्ध साहित्य के सुविख्यात विद्वान एवं गहन अध्येता हैं। उन्होंने भगवान बुद्ध के मूल उपदेशों का गहन अध्ययन, विश्लेषण एवं संदर्भात्मक विवेचन करते हुए उन्हें सरल, सुबोध और पाठक-अनुकूल रूप में प्रस्तुत करने का कार्य किया है। बौद्ध दर्शन, अष्टांग मार्ग, चार आर्य सत्य तथा मध्यम मार्ग जैसे विषयों पर उनकी विशेष पकड़ रही है।
डॉ. वर्मा का यह प्रयास प्राचीन पालि ग्रंथ मज्जिम निकाय के मूल स्वरूप और भाव को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक पाठकों के लिए बौद्ध विचारधारा को सहज रूप में उपलब्ध कराना है। उनके लेखन की विशेषता यह है कि वे गूढ़ दार्शनिक विचारों को भी सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं, जिससे यह ग्रंथ जिज्ञासु पाठकों, शोधार्थियों एवं सामान्य पाठक वर्ग सभी के लिए उपयोगी बन जाता है।
‘भगवान बुद्ध के मूल उपदेश’ का यह द्वितीय भाग भी उनके इसी सतत शोध, साधना और साहित्यिक समर्पण का परिणाम है।
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भगवान बुद्ध के उपदेशों को यदि एक शब्द में समाहित करना हो तो "प्रतीत्यसमुत्पाद" शब्द निचोड़ है उनकी शिक्षाओं का अर्थात "इसका कारण यह है" । पूरी तरह तर्क और प्रज्ञा पर आधारित वैज्ञ
भगवान बुद्ध के उपदेशों को यदि एक शब्द में समाहित करना हो तो "प्रतीत्यसमुत्पाद" शब्द निचोड़ है उनकी शिक्षाओं का अर्थात "इसका कारण यह है" । पूरी तरह तर्क और प्रज्ञा पर आधारित वैज्ञानिक धर्म जो कि अपने मूल स्वरूप और मूल भूमि को खो चुका है । इसे ही पुनर्जीवित करने का प्रयास किया महामना राहुल सांकृत्यायन जी ने। उनके द्वारा तिब्बत से खच्चरों पर लाद कर लाए गए बौद्ध ग्रंथ और उनका अनुवाद किया हिंदी में । उसी में से एक ग्रन्थ मज़्झिम निकाय का सरल संस्करण का दूसरा भाग प्रस्तुत है । मज़्झिम निकाय के बारे में कहा जाता है कि यदि एक बार फिर संपूर्ण बौद्धिस्ट वांग्मय नष्ट हो जाए और केवल मज़्झिम निकाय बचा रहे तो बुद्धिस्ट सिद्धांत अपने मूल स्वरूप में बचे रहेंगे।
मन रोमांचित हो उठता है यह सोच कर कि आज से 2500 वर्ष पहले, आधुनिक सभ्यता की शुरुआत के समय कितनी जकड़न रही होगी सामंती शक्तियों की । उसी के बीच भगवान बुद्ध की वह वाणी जिसने भेदभाव पर आधारित ब्राह्मण धर्म को सिरे से नकार दिया उन्हीं ब्राह्मण और राजन्य के सामने, परन्तु इस हिसाब ने कि सभी नतमस्तक हुए और सभी ने सिर माथे पर लिया इस श्रद्धा के साथ कि उनके बाद उनकी राख की पूजा की परंपरा चलती रही सहस्त्राब्दियों तक चैत्य और स्तूप के रूप में । उसी बुद्धवचन को मूल स्वरूप में लाने का एक छोटा सा प्रयास है इस पुस्तिका में।
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