दर्शन शब्द का शब्दार्थ केवल देखना या सामान्य देखना ही नहीं है। दर्शन-शास्त्र हमें प्रमाण और तर्क के सहारे अन्धकार में ज्योति प्रदान करके हमारा मार्ग-दर्शन करने में समर्थ होता ह
अष्टाध्यायी छह वेदांगों में मुख्य माना जाता है।अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं
A rare and much less known text Shrutisara Samuddharanam is a composition by Shri Totakacharya, one of the four disciples of Shri Bhagavatpada Adi Sankara . Though most of the Prakarana Granthas are on the same subject of oneness of jiva and brahman, ideas basic to Advaita Vedanta, this work is unique in certain ways. Firstly, it is composed in a meter that is named after the AchArya as Totaka meter. These verses are melodious when sung with their breath
अष्टाध्यायी छह वेदांगों में मुख्य माना जाता है।अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं
समास शब्द-रचना की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अर्थ की दृष्टि से परस्पर भिन्न तथा स्वतंत्र अर्थ रखने वाले दो या दो से अधिक शब्द मिलकर किसी अन्य स्वतंत्र शब्द की रचना करते हैं।
समा
Ashtadhyay is considered to be the main of the six Vedangas. The Ashtadhyay has eight chapters and each chapter has four padas. The first and second chapters contain formulas on nouns and definitions and also regulatory cases of the interrelationship of verbs and noun words in the sentence, such as atmanepada-parasmapada cases for verbs, and inflection, compounds, etc. for nouns. The third, fourth and fifth chapters prescribe all kinds of suffixes. The third c
अष्टाध्यायी छह वेदांगों में मुख्य माना जाता है।अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं
स्वामी निरंजन देव तीर्थ, गोवर्धन मठ के १४४ वें शंकराचार्य थे। वे औदिच्य कुल के ब्राह्मण थे तथा उनका नाम श्री चंद्रशेखर दवे था। श्री चंद्रशेखर दवे ने वाराणसी आदि क्षेत्रों में
वैशेषिक, भारतीय दर्शनों में से एक दर्शन है। इसके मूल प्रवर्तक ऋषि कणाद हैं। यह दर्शन न्याय दर्शन से बहुत साम्य रखता है किन्तु वास्तव में यह एक स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन
अष्टाध्यायी छह वेदांगों में मुख्य माना जाता है।अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं
सांख्य दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य विषय चेतन और अचेतन का विवेक कराना है। 'पुरुष' पद चेतन का प्रतीक है। संसार में अनुभूयमान त्रिगुणात्मक अचेतमतत्त्व' प्रकृति का अंश है। इससे सर्वथ
न्याय दर्शन भारत के छः वैदिक दर्शनों में एक दर्शन है। इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम हैं जिनका न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। जिन साधनों से हमें ज्
योगसूत्र ग्रंथ महर्षि पतंजलि द्वारा रचित है। यह ग्रंथ सूत्रों के रूप में लिखा गया है। सूत्र-शैली भारत की प्राचीन दुर्लभ शैली है जिसमें विषय को बहुत संक्षिप्त शब्दों में प्रस्त
सिद्धान्तकौमुदी संस्कृत व्याकरण का ग्रन्थ है जिसके रचयिता भट्टोजि दीक्षित हैं। इसका पूरा नाम "वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी" है। भट्टोजि दीक्षित ने प्रक्रियाकौमुदी के आधार पर सिद
अष्टाध्यायी छह वेदांगों में मुख्य माना जाता है।अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं
गीतगोविन्द जयदेव की काव्य रचना है। गीतगोविन्द में श्रीकृष्ण की गोपिकाओं के साथ रासलीला, राधाविषाद वर्णन, कृष्ण के लिए व्याकुलता, उपालम्भ वचन, कृष्ण की श्रीराधा के लिए उत्कंठा,
Paniniya Ashtadhyayi is not only about the general and Vedic words of Sanskrit grammar but also gives precise knowledge of Sociology (Anthropology), History (Purana), Politics, and Geography. Along with this, it also analyzes the ancient Indian cultural, social, political, and geographical conditions.
मीमांसा या पूर्वमीमांसा दर्शन हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक है जिसमें वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या बड़े विचार के साथ की गयी है। इसके प्रणेता जैमिनी हैं। मीमांसा दर्शन मे
उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है - ‘समीप उपवेशन’ या 'समीप बैठना (ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना)।यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ उपसर्ग तथा, ‘सद्’ धातु से
कालक्रमसे विलुप्त वैदिक ज्ञान-विज्ञानको तपोबल तथा समाधिसिद्ध प्रज्ञाके अमोघ प्रभावसे प्रकट करनेवाले तथा विकृत ज्ञान-विज्ञानको परिस्कृत करनेवाले एवम् अराजकतत्त्वोंका दमन
श्रीशंकरानन्द कृत ईशावास्य दीपिका -
ईशोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत उपनिषद है। प्रमुख् दश उपनिषदों में यह उपनिषद् , अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमे
तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं।
तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्
अर्थसंग्रह पूर्वमीमांसा का ग्रंथ है, और वह भी कर्मकाण्डपरक। अव्युत्पन्न बालकों का जैमिनिशास्त्र में प्रवेश हो सके, इसलिये अर्थसंग्रह नामक ग्रंथ की रचना हुई है। निश्चय ही अर
व्याकरण के समस्त ग्रन्थों में अष्टाध्यायी का मूर्धन्य स्थान है। इसीके कारण पाणिनि जी की कीर्तिपताका अद्यावधि फहरा रही है। इस अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और एक-एक अध्याय में
पाणिनीय अष्टाध्यायी केवल संस्कृत व्याकरण के लौकिक एवं वैदिक पदों की सिद्धिमात्र ही नहीं करती, अपितु इसके अध्ययन से समाजशास्त्र (मानवशास्त्र), इतिहास (पुराण), राजनीति एवं भूगोल
पाणिनीय अष्टाध्यायी केवल संस्कृत व्याकरण के लौकिक एवं वैदिक पदों की सिद्धिमात्र ही नहीं करती, अपितु इसके अध्ययन से समाजशास्त्र (मानवशास्त्र), इतिहास (पुराण), राजनीति एवं भूगोल
व्याकरण के समस्त ग्रन्थों में अष्टाध्यायी का मूर्धन्य स्थान है। इसीके कारण पाणिनि जी की कीर्तिपताका अद्यावधि फहरा रही है। इस अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और एक-एक अध्याय में
अष्टाध्यायी महर्षि पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ है।इसमें आठ अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं; प्रत्येक पद में 38 से 220 तक सूत्र हैं। इस
o What is the meaning of liṅga in Śiva Liṅga?
o How old is Hinduism?
o How does one develop the act of taking the right decision at the right time?
o Why does the mind get distracted while chanting mantras?
o Should one believe in palmistry?
o Why do the youngsters today go abroad?
All of us have asked these questions and many more at some point in time.
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