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"It was a wonderful experience interacting with you and appreciate the way you have planned and executed the whole publication process within the agreed timelines.”
Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Pal‘बिखरे पत्ते बाग में' मेरे
है चादर एहसासों की,
अगर थका तू खुद को समझे
प्राण वायु है साँसों की ,
जीवन के हैं अपने रंग ढंग
तेरे रंग ढंग हैं अपने ,
सच ही सच है इन पत्तों में
सपने भी सच्चे सपने ,
उठा लिया है जब हाथों में
तब तू ले जाना मत भूल ,
स्वर्ण नहीं कहता मैं इनको
पर ये हैं भावों के फूल ,
पर ये हैं भावों के फूल I
पं. पंकज कुमार भट्ट
पं. पंकज कुमार भट्ट का प्रथम काव्य संकलन "बिखरे पत्ते बाग में" , ‘माँ अब मैं बड़ा हो गया हूँ’ एवं ‘औरत औरत की है दुश्मन’ सहित 45 कविताओं को संजोए हुए है I विगत 24 वर्षों से भारतीय रेलवे की सेवा के साथ-साथ अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. एवं अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करना और साथ ही कविताओं का लेखन, भाषा एवं साहित्य में उनकी रुचि को दर्शाता है I जीवन के कुछ विभिन्न पहलुओं के प्रति उनके दर्शन को चित्रित करती सहज एवं सरल भाषा में लिखी गई कविताएं कहीं न कहीं आपके एवं हमारे विचारों को ही प्रतिबिंबित करती हैं I संकलन में छंद मुक्त कविताओं की अधिकता है, अधिकांश कविताएं कन्वरसेशनल टोन में ही लिखी गई हैं जो इसे गद्य काव्य जैसा रूप प्रदान करती हैं I कुछ कविताएं मोटिवेशनल संभाषण एवं प्रेरक प्रसंगों की तरह निश्चित ही पाठकों को जीवन पथ पर दृढ़ता से बढ़ने हेतु प्रेरित करेंगीं एवं कुछ कविताओं के साथ निश्चित ही आपका मन, मस्तिष्क नई कल्पनाओं की सैर करेगा कविताओं में साहित्यिक अलंकारों का अभाव होते हुए भी भाषा की सरलता एवं विचारों की सहजता स्वतः ही अलंकारों के स्थानों को सुशोभित करती है I
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