संस्थाओं के परिसर में ऐसा देखा गया कि मेहमानों और आगंतुकों क बुलाकर भोजन कराने की व्यवस्था शुरू हो चुकी है और इस काम में एक बड़े वर्ग को लगाया भी गया है ; हो सकता है संस्था की कमाई भी बढ़ी हो, पर विचार और संस्कार को उस रौनक के नीचे दब जाते हुए देखा गया | अधिकांश वरिष्ठ मित्रों और कार्यकर्ताओं का भी यही मत है कि संस्थाएँ अपने मूल ध्येय से भटक चुकी है और उनके सामने अपने ही अस्तित्व को टिकाए रखने का प्रश्न निर्माण हो चुका है | कई सस्थाओं को जनता जनार्दन मे