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Ye Bhi Guzar Jayega / ये भी गुज़र जाएगा

Author Name: Dr. Rekha Dwivedi | Format: Paperback | Genre : Poetry | Other Details

मैं  अगर एक वाक्य में  कविता और शायरी   के विषय में कुछ  कहना चाहूँ तो ये मैंने  नहीं  लिखी  है बल्कि  इन्होंने  मुझे लिखा है।

कुछ लोग लिख-लिख कर जीते हैं  और कुछ जी-जी कर लिखते हैं।मैं  शायद उनमें  से हूँ जो लिख -लिख कर जीते हैं ।

"ये भी गुज़र जाएगा" में जो भी कविताएं और शायरी हैं उनका मेरी पूर्व पुस्तक 'ये अजीब औरतें 'की तरह कोई एक विषय नहीं है,

इसमें "इश्क भी है और दुनियादारी भी है , खुद पे खुद की पहरेदारी  भी है।"

इसकी यात्रा करते वक्त आपको हर कदम पर एक नया स्वाद और रहस्यमयता का आभास मिलेगा।चूंकि कविता स्वयं बोलती है अतः यदि मैं इसके विषय  में  ज्यादा  बात करना करूँ  तो अनुचित होगा।

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डॉ. रेखा द्विवेदी

मेरा जन्म  उत्तर प्रदेश  के एक छोटे से गांव अटवा अली मर्दनपुर में हुआ और प्रारम्भिक शिक्षा  वहीं  के हिन्दी  मीडियम स्कूल "लाल बहादुर  शास्त्री"  से हुई। जहाँ  वैभव तो नही परन्तु वैचारिक  मूल्य अवश्य  थे। मुझे बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। थोड़ी और बड़ी हुई तब तो कवि और लेखक  ही हमारे हीरो थे। और बड़े होकर समझ में  आया कि माता पिता तो बच्चों  को सिर्फ  पालते हैं असल में  बनाते तो यह लेखक और कवि ही हैं।कब यह पढ़ने का शौक लिखने में  बदल गया पता ही नहीं  चला। विवाह के पश्चातआई.आई.टी. कानपुर में  रहने का अवसर मिला जहाँ परिवेश  पत्रिका में  मेरी पहली रचना प्रकाशित हुई और वहीं कानपुर  विश्वविद्यालय से बी.ए. पास किया।पुस्तकें पढ़ने  का शौक बचपन से था यहाँ  उसे और भी निखरने का अवसर मिला। इसके पश्चात  जीवन के लगभग बीस वर्ष  मेघालय ,शिलांग  में बीते जहाँ  से बी.एड.कर सेंट एडमंड्स एवं पाइन माउन्ट्स में  शिक्षण के साथ-साथ रेडियो कार्यक्रमों एवं कवि गोष्ठियों  में हिस्सा लेना शुरू किया,यहीं से मेरी रचनात्मकता की शुरुआत  हुई और फली- फूली,साथ-साथ हिन्दी  सेंटिनल के लिए  लिखना शुरू  किया।यहीं  मेरी पहली कविता की पुस्तक "जागती आँखों के सपने" प्रकाशित  हुई। यहीं रहकर मैंने हिन्दी  साहित्य  में  एम.ए.और फिर  "जैनेन्द्र  के कथा साहित्य  में  नारी पात्र"नामक विषय पर गौहाटी विश्वविद्यालय से शोध कार्य  किया। इस बीच दो वर्षों  के लिए  जर्मनी  में  प्रवास का अवसर मिला  जहाँ  जर्मन भाषा और वहां  की सभ्यता और संस्कृति  सीखी। तत्पश्चात ईटानगर,अरुणाचल विश्वविद्यालय  के हिन्दी  विभाग में   लेक्चरर के तौर पर कार्य करने का अवसर मिला जहाँ  से "अरुड़िमा" नामक जरनल निकाला एवं "हिरण्यगर्भा"नामक कविता की पुस्तक  प्रकाशित की। इसके बाद अमेरिका  में  निवास के दौरान  भी हिन्दी  गोष्ठियों  में  हिस्सा  लिया और न्यूयार्क  से छपने वाली पुस्तक  में  कविताएं  प्रकाशित  हुईं। वहां  से वापस आकर दिल्ली में  "नेशनल फाउण्डेशन फार कम्युनल हार्मोनी "में डायरेक्टर  के पद पर कार्य करते हुए लगभग तेरह पुस्तकें  प्रकाशित  कीं और "कैफेराटी" नामक क्रिएटिव  ग्रुप का हिस्सा  रही। वहां  से रिटायरमेंट के बाद "ये खबरें  नहीं  छपती' और "कल्पित कथाएं " कहानी संग्रह  प्रकाशित  हुए। इस बीच दिल्ली,सिडनी और लंदन में  रहने का अवसर मिला  जहाँ विशेष तौर पर सिडनी  एवं दिल्ली में  होने वाले साहित्यिक &n

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