मनुष्य के जन्म के साथ और उसके जीवन के अंत तक मनुष्य का कईं भावोसे, रसोसें, रंगोंसे, भावनाओंसे परिचय होता हैं. कहीं तालमेल बैठता है तो कहीं टकराव, कहीं अलगाव, कहीं मिलाप. अलग अलग घटनायें और जीवन के विभिन्न अनुभवों में इन भावो के उच्चतर सीमा पर पहुंचने पर व्यक्ति/मानव जीवन के सभी रंगो का और रसोंका दर्शन करता हैं जो इन भाव-विभोर अवस्था को पार कर लेता है वो मानो जीवन के मर्म को कुछ हद तक समझ पाता हैं. हम हर भाव को किस अवस्था में जीते हैं, किस लेवल तक आनंद उठा सकते हैं, अपने पैशन या इंटरेस्ट या अपनी वीकनेस या स्ट्रेंथ को कितने स्तर तक ऊपर ले जा सकते है बस इसी कशमकश में हम अपना जीवन जीते है और उस भाव-भावना की अवस्था अनुरूप हमारा जीवन सफल या असफल रूपमें विकसित होता जाता है. हर भाव का अपने सीमा के उच्चतम स्तर पर पहुंचना भाव-विभोर अवस्था कहलायेगा.इस अवस्था में वो उस रस या भाव का असली मर्म-भाव जान पायेगा इसीलिये इस अवस्था को पार करने के बाद ही इंसान के जीवन में परिवर्तन (ट्रांसफॉर्मेशन) की शुरुआत होती है. कुछ हादसे, घटनायें जीवन की दिशा बदल देती है ये भी उसीका एक स्वरुप है. अपनी सोच को अच्छी उड़ान देने पर वो शीर्ष स्तर पर पहुंच कर अच्छा ही परिणाम देगा जिससे आपका जीवन भी आनंद-विभोर हो जायेगा.
इन परिवर्तनशाली, आविष्कारक, संवेदनशील मानवीय कल्पनाओंको को और उसकी उच्चतम सीमाओं (भाव-विभोर अवस्था) को समर्पित
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