आदिकाल से ही इतिहास एक कौतूहल और जिज्ञासा का विषय रहा है। इतिहास के गर्भ में विश्व के सभी विषय समाहित है। कहा भी जाता है कि इतिहास सभी विषयों की जननी है। यह एक दर्पण है, जिसमें समाज में घटित सभी प्रकृति की घटनाओं का आरेख और प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकता है। इतिहास प्रेरक भी है और संदेशक भी है। इसकी भूमिका व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में अमिट एवं अमूल्य है। व्यक्तिगत जीवन में इसकी महत्ता इसलिये है क्योंकि इससे हम सीखकर वर्तमान को सम्हालते और संवारते है तथा भविष्य का निर्माण करते है। जबकि सामाजिक जीवन में वर्तमान के प्रत्येक प्रयोग की बुनियाद अतीत की घटनाओं का अन्वेषण और स्पंदन है, जिससे भविष्योन्मुखी समाज की परिकल्पना को आकार दिया जाता है। वर्तमान मनुष्य और जागरूक नागरिक प्राकृतिक शक्तियों से भरपूर इसलिये है क्योंकि इतिहास ने मनुष्य की उत्पत्ति के रहस्यों एवं वैज्ञानिक अनुभवों से इसे परिचित कराया, ज्ञान दिया जिसके आधार पर सामाजिक परिवर्तन के अनुकूल नवीन आविष्कारों का उपयोग कर मनुष्य ने स्वयं अपने को परिमार्जित किया। यहाँ यह कहना उचित होगा कि हमने इतिहास से यदि भारत की परतंत्रता और अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति क्रूर व्यवहार को नहीं पढा होता तो शायद हम स्वाधीनता के अर्थ और राष्ट्र निर्माण में हम अपने दायित्वों को नहीं समझ पाते।