दर्द में झुलसा हुआ मन, और चेहरे पर धुआँ
है जहां मुट्ठी में फिर भी, लोग तनहा हैं यहाँ
कहने को तो हैं हज़ारों लोग और रिश्ते तमाम
पर अंधेरे में उजाले के लिए जाएँ कहाँ
कौन है जो मन लगाकर के पढ़े मन की किताब
कौन है दिल से सुने जो, टूटे दिल की दासतां
है ये असली फूल या कागज़ के नकली फूल हैं
अब यहाँ पहले सी मंडराती नहीं हैं तितलियाँ
यहा ख़ुदा क्या हो गया है, आजकल इन्सान को
आदमीयत की चिता पर, आदमी की रोटियाँ