कविता लिखना कभी कोई योजना नहीं थी — ये तो एक दिन यूँ ही हो गया, जैसे सुबह की चाय में गलती से इलायची पड़ जाए और उसका स्वाद अच्छा लगने लगे।
मैंने कविताएँ तब लिखनी शुरू कीं जब कुछ एहसास, कुछ सवाल, लोक सेवा परीक्षा के नोट्स में समा नहीं पा रहे थे।
"हवा में ठहरे शब्द" मेरी पहली कविता-पुस्तक है, जिसमें कुल 91 रचनाएँ हैं — कुछ मेरी आत्मा की आवाज़ हैं, तो कुछ समाज और प्रकृति से उपजी संवेदनाएँ।
प्रकृति मेरे लिए पेड़-पौधों का नाम नहीं, एक दोस्त है जो चुपचाप मेरे साथ बैठती है।
सुबह की धूप, बारिश की बूँदें, और किताबों के मुड़े कोने — सब मेरी कविताओं में उतरते चले गए।
लेकिन मेरी लेखनी सिर्फ़ प्रकृति तक सीमित नहीं रही।
जब समाज की जटिलताएं — जैसे दहेज प्रथा, जातिवाद, भ्रष्टाचार — मन को बेचैन करती थीं, तब भी मैंने शब्दों का सहारा लिया।
मेरे लिए कविता, सवालों को टालने का नहीं, उन्हें समझने और सहने का तरीका बन गई।
थोड़ा हास्य भी जरूरी था — “चाय की चुस्की” और “मैं हारा हूँ” जैसी कविताएँ मेरी अपनी ज़िंदगी की सच्ची झलकियाँ हैं।
ये किताब मेरे दोस्तों, मेरे विचारों, मेरी हार-जीत और मेरे सपनों की साझी आवाज़ है। शब्दों के ज़रिए मैंने खुद को टटोला है। अगर इन कविताओं में आप कहीं खुद को पाएँ — तो मेरा लिखना सफल हो जाएगा।
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