ग़ज़ल संग्रह ‘‘ख़ूनी प्यास का पत्थर’’ में शायर अपने अशआर में कभी महबूब की प्रशंसा करते नजर आता है, तो कभी समाज से कुरीतियाँ मिटाने के लिए शिक्षक की भूमिका में खड़ा दिखाई देता है। कभी कुत्सित राजनीति पर प्रहार करता है, तो कभी दीपक बनकर अँधेरों से लड़ने का प्रयास भी करता है। नायिका को रिझाने और मनाने के लिए शायर का नायक क्या-क्या कोशिशें नहीं करता। शायर नायिका के हुस्न की खुले दिल से तारीफ़ करता हैं। दोस्ती ऐसा लफ्ज है, जिसकी व्याख्या की जाए तो ग्रंथ लिखे जा सकते हैं, लेकिन अफ़सोस, आज इस रिश्ते ने अपने मानी खो दिए हैं। बाहरी चमक-दमक की ओर निरंतर भागते लोगों को अपने भीतर बढ़ते जाते अँधेरों की न कोई जानकारी है, न ही फ़िक्र। आज दोस्ती का मतलब दगाबाजी समझा जाने लगाहै। शायर ने अपनी ग़जलों में इस राज़ का पर्दाफ़ाश बखूबी किया है। शायर के तमाम अश्आर किसी की आवाज़ें हैं, जिन्होंने ग़ज़लों, नज़्मों का रूप धर लिया। वह तमाम आवाज़ें शायर के वजूद की गहराइयों से उभरी हैं। यह ग़ज़ल संग्रह निश्चित ही पाठकों को पसन्द आएगा।