आजकल मेरे चेतन-अचेतन, दोनों ही मन अन्यमनस्क हैं। कविता मेरे प्राणों में बसती है इसलिए लेखन जीवित है।
कुछ आयु का, कुछ परिवेश का, कुछ वातावरण का और कुछ अन्यमनस्कता का, समवेत प्रभाव यह है कि अपनी ही पुस्तक का उपोद्घात् लिखना तक बहुत दुष्कर लगने लगा है। आज प्रातः गिर गया, शरीर में गुप्त चोटें आई हैं कुछ दिन में पीड़ा का भी शमन हो ही जाएगा।