‘‘नदी के दो किनारे’’ मुक्तकों का एक चुना हुआ गुलदस्ता है। यह समाज के लिए अधिक उपयुक्त सिद्ध होगा क्योंकि इसमें उत्तरोत्तर दृश्यों द्वारा संगठित पूर्ण जीवन या उसके किसी पूर्ण अंग का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि प्रत्येक मुक्तक में एक रमणीय खण्ड-दृश्य को इस प्रकार सहसा सामने लाकर प्रस्तुत कर दिया गया है कि पाठक या श्रोता कुछ क्षणों के लिए मंत्रमुग्ध-सा हो जाता है। इसीलिए मुक्तकों का प्रयोग मंचों पर भी किया जाता रहा है। इसके लिए कवि ने मनोरम वस्तुओं और व्यापारों का एक छोटा स्तवक कल्पित करते हुए उन्हें अत्यंत संक्षिप्त और सशक्त भाषा में प्रदर्शित करके प्रस्तुत किया है। उन्मुक्त लयों में निबद्ध इन मुक्तकों में कवि ने विविध वर्णी विषयों का संवेदनात्मक प्रभावशाली प्रतिपादन किया है, जो पाठक के हृदय-तल तक सीधे उतरता चला जाता है। इन मारक मुक्तकों में शैल्पिक अनुबंध के ऊपर अभिव्यक्ति की प्रभविष्णुता का वर्चस्व सहजता से देखा जा सकता है। कवि की शैली सदैव संवेदनशील रही, संवेदना की सिहरन ही इनकी रचनाएँ हैं शब्द व्यंजना एवं व्याकरण की कसौटी पर खरी उतरने वाली रचनाएँ सदैव समाज और साहित्य को देश को आलोकित करेंगी। यह बहुआयामी और इन्द्रधनुषी मुक्तक काव्य संग्रह ‘‘नदी के दो किनारे’’ पाठकों को शब्द और भावों के सुरभित आनन्द कानन में विहार कराने में पूर्ण सफल रहेगा।