महा सुख का कमल तो ऐसे सरोवर में ही खिलेगा जो शान्त शीतल और सहज हो जो विधि और निषेध की लहरों से पूर्णतः मुक्त हो कोई कृत्रिमता नहीं कोई विरोध नहीं शास्त्रों की सम्मति एवं महाजनों के पदचिह्न तो सामने उत्खचित हैं ही।
पिछले चन्द दशकों से अंग्रेजियत की खुमारी में भारतीयता छटपटा रही है। हमारी सोच प्रदूषित हो गयी है। अहं के द्वन्द्व युद्ध में परिवार टूट गया है। जिस आदर्श व्यक्तित्व से पारिवारिक ढाँचा का स्वरूप सुदृढ़ रह पाता उसको ही तिरस्कृत कर दिया गया है। परिवार के पक्षधर रात-रात भर अतीत के सपनों में कोई नवीन मार्ग निकाल सकें कर्तव्य और अधिकार की सुस्पष्ट व्याख्या कर सकें विभिन्न तर्कों से बनी-बनायी रसोई खाने वालों की यथेष्ट भर्त्सना कर आदर्श व्यक्तियों की पीठ थपथपा सकें तो निश्चित रूप से समाज और राष्ट्र की अटूटता पुनः लीक पर आ जायेगी।
इस लघु काव्य में कुछ इन्हीं स्मृतियों से बुद्धिवादियों को झकझोरने का प्रयास किया गया है। वर्तमान की बांहों में अतीत केा दुलारते हुए भविष्य को संवारने की अनिवार्यता उपनीत की गयी है।