तुम कौन हो? यह एक मात्र ऐसा प्रश्न है, जिसे प्रेम कहानी में किसी एक पक्ष से पूछा ही जाता हैं। केशव! आखिर तुम कौन हो? यूं तो अनजान हो, मगर जाने पहचाने से लगते हो। यूं तो कोई रिश्ता नहीं हैं हमारे बीच में, मगर फिर भी तुम मुझे वर्षो पुराने से लगते हो। आखिर तुम कौन हो, जिसके ख्याल मुझे सोने नही देते, क्यूं तुम्हारे चेहरे मेरे आखों से सामने से ओझल ही नही होते। सच कहो! तुम कौन हो?
वो कहते हैं ना! की प्रेम होने के पश्चात् कोई फर्क ही नहीं पड़ता की आखिर तुम कौन हो? तुम कौन हो, तुम क्या हो, तुम क्यों हो? तुम्हारी जाति क्या हैं? तुमरी औकात क्या हैं? तुम कितना कमा लेते हो? या तुम क्या करते हो? ये सभी प्रश्न बस एक बेतुकी बात सी लगने लगी हैं, जब आपको सच में किसी से सच्ची मोहब्बत हो जाती हैं।
यह पुस्तक इन्ही प्रश्नों से शुरू हुई एक प्रेम कहानी से जुड़ी हुई हैं। जिस प्रेमी जोड़े का नाम अंकिता और अनुराग था। अंकिता और अनुराग की भी मुलाकात इसी प्रश्न के साथ हुआ था की तुम कौन हो? इस कहानी को मैं वास्तविक तो बिलकुल नही कह सकता हूं मगर हां इस कहानी को काल्पनिक कहना भी सही नही होगा। यह कहानी काल्पनिक जरूर हैं, मगर मुझे यकीन हैं इस पढ़ने के मध्य में इस कहानी के वास्तविक रूप को खुद में जरूर महसूस करेंगे।