"व्याकुल मन" पुस्तक व्यक्ति के जीवन के तमाम प्रकार के व्याकुलता का परिचायक है।
व्याकुलता चाहे किसी संघर्ष में हो, प्रेम में हो , प्रतिशोध में हो , प्रतिस्पर्धा में हो, वो हमेशा व्यक्ति के जीवन शैली के पैमाने को निर्धारित करती हैं। जीवन में व्याकुलता का महत्व उतना ही है, जितना कंठ के सूख जाने पर जल पाने की इच्छा की होती है। व्याकुलता ही व्यक्ति को एक सक्रियात्मक प्राणी बनाता है। जीवन में किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए व्याकुलता का ही सबसे बड़ा योगदान एवं महत्व होता है। व्यक्ति की इच्छा शक्ति उसकी व्याकुलता पर निर्भर करती है। मैं ये नहीं कहता हूं कि व्याकुलता व्यक्ति के सभी आयामों को सफल परिणाम देती है, क्योंकि जहांँ एक और व्याकुलता व्यक्ति को लक्ष्य की ओर ले जाता है, वहीं दूसरी ओर कभी-कभी इसमें कई सारे विभिन्न प्रकार के दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं।
इस पुस्तक के माध्यम से मैं लोगों को खासकर युवाओं को यही संदेश देना चाहता हूं की व्याकुलता की भावना उस हद तक ही उचित एवं सही है, जहां तक हम अपने और दूसरों को शारीरिक एवं मानसिक आघात ना पहुंँचाएं। व्याकुलता की आंधी में हम इतने अंँधे ना हो जाए कि ये भूल जाए कि ये जीवन हमें एक ही बार मिला है, ये परिवार, ये लोग हमें एक ही बार मिले हैं। हमें हर व्याकुलता की समय सीमा तय करनी होगी। जिससे व्याकुलता का काम सिर्फ जीवन में लक्ष्य निर्धारण, लक्ष्य प्राप्त तथा इससे प्राप्त खुशियां एवं उसकी उत्पत्ति-प्रसार तक ही सीमित रह सके। इसके अतिरिक्त कोई भी कल्पना, कोई भी आशा, कोई भी व्याकुलता घातक ही साबित होगी।