अंगारे
दिसंबर 1932 ई० लखनऊ की ‘निज़ामी प्रेस’ से “अंगारे” शीर्षक से एक किताब प्रकाशित हुई। उर्दू में अपने तर्ज़ की यह एक अलग ही किताब थी। जिसमें 9 कहानियाँ और एक ड्रामा शामिल है। यह कहानी और ड्रामा लिखने वाले लेखकों में 3 मर्द और 1 औरत जिनके नाम सज्जाद ज़हीर, अहमद अली, रशीद जहाँ और महमूदुज़्ज़फ़र हैं। “अंगारे” ने समाज के कई तबकों पर आबले का काम किया। जिसकी जलन से ब्रिटिश भारत में कोहराम सा मच गया। जगह जगह विरोध होने लगे। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में इस किताब की निंदा करते हुए लेख छपने लगे। मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा फ़तवे दिए जाने लगे।
15 मार्च 1933 ई० को आखिर वो दिन आ ही गया जब भारतीय दण्ड संहिता की धारा 295A के तहत ब्रिटिश संयुक्य प्रांत सरकार ने “अंगारे” पर प्रतिबंध लगा दिया। “अंगारे’ की 5 प्रतियाँ छोड़ समस्त प्रतियाँ जला दी गईं और इन प्रतियों को ब्रिटिश पुस्तकालय व इंडियन ऑफिस कलेक्शन में भेज दिया गया।
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