आशियाना-जिस तरह किसी मकान को घर बनाने के लिए परिवार कि ज़रूरत होती है,उसी तरह हर इन्सान को एक आशियाने कि ज़रूरत होती है।आशियाना मतलब घर ,और घर तब तक घर नहीं होता है जब तक कि वहां सबों के बीच प्रेम कि धारा न बहती हो,ठीक इसी प्रकार आशियाना भी तब पूर्ण होता है जब उस नगरी में आशिक हो।ऐसा आशिक जो दीवानगी फैला दे,इश्क़ के नाम पर फ़रेब नहीं सब को प्यार करना सिखा दे,सब को जवां दिल बना दे और सब को मिला के पुरे संसार को एक परिवार बना दे।आशिक़ी एक ऐसा जुनून है जिसकी जुनूनियत का कोई हद नहीं।आशिक तो बेगाने होते है, सच कहूँ तो परवाने होते हैं, ना सुबह कि फिक्र होती है ना शाम का पता वो तो बस प्यार के एहसास में खोये रहते हैं।
जिस प्रकार हीरे कि परख जोहरी को होती है उसी प्रकार प्रेम को पहचानने कि परख एक आशिक़ को होती है,आज के दौड़ में आशिक तो बहुत मिल जाते है कसमे भी बहुत खाते है और वादे भी बहुत कर जाते हैं पर निभाते वही हैं जो सच्चे आशिक होते हैं ,सच्चे आशिक कभी धोखा नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं धोखे का दर्द होता है क्या नैया को मजधार में छोड़ने से होता है क्या !
इस जीवन रुपी नैया में “आशियाने” का बड़ा ही मोल होता है | घर तो बन जाते हैं चंद रुपयों में पर “आशियाना” बनाने में बड़ा ही मोल लगता है क्योंकि वो अनमोल होता है ।
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