पंच भौतिक प्रकृति की जैविक सृष्टि में मानव-चेतन सत्ता के रुप में उद्भूत वाणी (भाषा) भाव (अभिव्यक्ति) चेतना (ज्ञान) का प्रतिफलन जीवन का चरम व्यापार लेकर प्रकट हुआ जो अपने आप में उद्भुत विविधता, विराटता, उपयोगिता, उपादेयता पोषण और धारण से भूषित जगत पृथ्वी के धरातल, वन, पर्वत, सागर, वायुमंडल और आकाश पर अपनी सत्ता कायम कर विश्व का शिरमौड़ बना जिसमें ज्ञान गुण और कला रुप निधि ही सर्वोच्च विद्या का श्रेय प्राप्त रहा।
आज यह मानव अखिल विश्व को अपने हाथों से गुणवत्ता वैचारिकता और सदाशयतता से संचालित कर रहा है। इन्हीं गुणात्मक गरिमा की विशिष्टता का सम्वरण आत्मिक नैतिक और बौद्धिक मानव पर मानव जीवन को सींचता हुआ जगत का कल्याण अबतक करता हुआ उसकी सत्यासत्य झाँकी आज के परिवेश में प्रस्तुत करने का प्रयास ही वह अध्यात्म दर्शन है जो आपको सादर हस्तगत कर रहा हूँ।
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